जानिए जम्मू-कश्मीर का पुरातन इतिहास ।

कैसे बना जम्मू-कश्मीर एक सुन्दर राज्य से विशेष राज्य,कब और कैसे हुए बदलाव ।

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) :जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला ने जो आंदोलन चलाया, उसके शासन को उदार बनाने का पहला कदम उठाया गया। बता दे कि यह  आंदोलन मुसलमानों के हित की लड़ाई लड़ने के लिए खड़ा किया गया था।1939 में आंदोलन का कौमी स्वरूप खत्म कर दिया गया और पहले कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के नाम से पहचाने जाने वाली उनकी संस्था अब नेशनल कांन्फ्रेंस हो गई। आगे चलकर इसे देसी राज्य प्रजा परिषद से जोड़ दिया गया।नेशनल कॉन्फ्रेंस महाराजा हरिसिंह के खिलाफ आंदोलन चलाती रही और 1946 में कांग्रेस आंदोलन से प्रेरणा लेकर शेख अब्दुल्ला ने ‘महाराजा कश्मीर छोड़ो’ आंदोलन छेड़ दिया। शेख गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें तीन साल की सजा हुई। पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वयं एक कश्मीरी थे और राज्य के प्रति उनका रवैया निहायत भावुकतापूर्ण था। वे जून 1946 में अपने गिरफ्तार मित्रों (खासकर शेख अब्दुल्ला) को प्रोत्साहित करना चाहते थे, लेकिन राजनीतिक आंदोलन के भय से राज्य सरकार ने नेहरूजी के प्रवेश पर रोक लगा दी। फिर भी नेहरूजी नहीं माने और गिरफ्तार कर लिए गए। कांग्रेस वर्किंग कमेटी इसके पक्ष में नहीं थी कि नेहरूजी राज्य का कानून तोड़ें और वहां गिरफ्तार कर लिए जाएं। शेख अब्दुल्ला से मित्रता के पीछे नेहरूजी की इस दीवानगी से सरदार पटेल बेहद गुस्सा थे। सरदार पटेल द्वारा 11 जुलाई 1946 को डीपी मिश्र (मध्यप्रांत, जो अब मध्यप्रदेश है) को लिखे पत्र में नेहरूजी के इस कार्य का उल्लेख मिलता है। इस पत्र में पटेल ने लिखा है, “अभी- अभी उन्होंने (नेहरूजी ने) ऐसी अनेक नादानियां की हैं जिनकी वजह से हमें बड़ी परेशानियां हुई हैं। कश्मीर में उठाया गया उनका कदम, संविधान सभा के लिए किए गए सिख चुनाव में उनका हस्तक्षेप और कांग्रेस महासमिति की बैठक के तुरंत बाद उनकी अखबारी परिषद, ये सब भावुकतापूर्ण अविवेक के कृत्य हैं। इनकी वजह से परिस्थितियों को सही मार्ग पर ले जाने में हमें जबर्दस्त तनाव से गुजरना पड़ता है। परंतु इस सारे अविवेक के बावजूद जवाहरलाल में स्वाधीनता के लिए अनुपम उत्साह और उत्कट लगन है। बाद में नेहरूजी को बेरिस्टर की हैसियत से शेख अब्दुल्ला के वकील के नाते कश्मीर की छोटी सी मुलाकात की इजाजत मिली थी। उस मौके पर उन्होंने सरदार पटेल को 20 जुलाई 1946 को पत्र लिखकर कहा था कि मैं 24 जुलाई को कश्मीर जाऊंगा और वहां अपनी प्रवृत्तियों को बेरिस्टर के कार्य तक ही मर्यादित रखूंगा। इस प्रकार जब कश्मीर के प्रधानमंत्री रामचंद्र कॉक थे, तभी नेहरूजी ने राज्य सरकार और महाराजा के साथ खुले मुकाबले में उतरने का मन बना लिया था। जून 1947 में देश की विभाजन योजना घोषित हुई। इसके साथ ही राज्य यानी कश्मीर की परिस्थितियों में एक नाटकीय मोड़ आया। लॉर्ड माउण्टबेटन ने महाराजा से कहा कि सत्ता के हस्तांतरण के लिए निश्चित हुई तारीख 15 अगस्त 1947 से पहले आपको संबंधित परिस्थितियों के प्रकाश में एक उपनिवेश या दूसरे उपनिवेश से जुड़ने का निर्णय कर लेना चाहिए। परंतु महाराजा के अनुसार इन परिस्थितियों के स्पष्टीकरण में वाइसराय का झुकाव पाकिस्तान की तरफ था। वाइसराय ने महाराजा को आश्वासन भी दिया कि यदि आप पाकिस्तान में मिलना पसंद करेंगे तो भारत कोई कठिनाई खड़ी नहीं करेगा। उधर, सरदार पटेल ने तीन जुलाई 1947 को कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री रामचंद्र कॉक और महाराजा को लिखे अलग- अलग पत्रों में स्पष्ट कर दिया था कि जम्मू- कश्मीर राज्य का हित बिना विलंब किए भारत से जुड़ने में ही है। भारत और पाकिस्तान में से किसी एक के साथ कश्मीर के जुड़ने का सवाल था। महाराजा दुविधा में थे। उनके सामने कई परेशानियां थीं। पाकिस्तान के साथ जुड़ने का अर्थ होता- घोषित सांप्रदायिक राष्ट्र के साथ जुड़ना और न केवल महाराजा और उनके वंश के लिए, बल्कि उनकी प्रजा के अल्पसंख्यक लोगों के लिए भी तत्काल पैदा होने वाला भय। ये अल्पसंख्यक वर्ग अनेक थे- जम्मू क्षेत्र के कश्मीरी पंडित, कश्मीर घाटी के हिन्दू और लद्दाख के बौद्ध। इसके अलावा कश्मीर घाटी के मुसलमान, जिनका राज्य की आबादी में तो बहुमत था, पर वे जातीय तथा भाषा की दृष्टि से पंजाबी और बाकी पाकिस्तान के अपने धर्म बंधुओं से भिन्न थे। दूसरी ओर यह संभावना भी थी कि भारत के साथ जम्मू- कश्मीर राज्य के जुड़ने से अलग तरह की उलझनें पैदा होतीं। बहरहाल, राज्य हर तरह से उलझन में था। स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर महाराजा ने प्रधानमंत्री रामचंद्र कॉक को बर्खास्त कर दिया। सरदार पटेल की मदद से महाराजा को मेहरचंद महाजन की सेवाएं प्राप्त हुईं, जो उस समय पंजाब उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। 15 अगस्त 1947 को देश का विभाजन हो गया। पाकिस्तानी आतंकवाद जो आज भी कश्मीर को चैन नहीं लेने दे रहा है, यह पाकिस्तान की पैदाइश के साथ ही शुरू हो गया था। सीमा पार से कबाइलियों को कश्मीर पर आक्रमण के लिए उकसाया जाने लगा। पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें हथियार दिए और घुसपैठ की गुंजाइश भी बनाई गई। जम्मू- कश्मीर राज्य भौगोलिक हिसाब से पाकिस्तान की अपेक्षा भारत से ज्यादा अलग और कटा हुआ था और महाराजा तथा उनकी फौज बेहद कमजोर। जिन्ना ने संभवत: यह मान लिया था कि कश्मीर की सत्ता को बिना किसी कठिनाई के उखाड़कर फेंक दिया जाएगा और राज्य पके सेब की तरह उनके हाथ में आ जाएगा। इस समय शेख अब्दुल्ला ने कूटनीतिक समझदारी दिखाई। उन्होंने 26 सितंबर,1947 को महाराजा को जेल से पत्र भेजा और अडिग वफादारी का वचन दिया। डरे- सहमे महाराजा ने इसका उत्तर अनुकूल दिया और बदले में सभी राजनैतिक कैदियों के लिए क्षमादान की घोषणा कर दी। 2 अक्टूबर, 1947 को सरदार पटेल द्वारा महाराजा को लिखे गए पत्र से भनक मिलती है कि इस तारीख के एक दिन पहले ही शेख अब्दुल्ला और उनके साथियों को जेल से रिहा कर दिया गया था। पाकिस्तान से किए गए कबाइली आक्रमण का वेग अक्टूबर, 1947 में बढ़ने लगा। महाराजा की फौज अनिवार्य रूप से इस ज्वार को रोकने में असमर्थ थी, क्योंकि फौज से भारी संख्या में मुसलमान सैनिक भाग गए थे और वह बेहद कमजोर हो चुकी थी। राज्य का काफी बड़ा भाग, जिसमें पहले गिलगित नाम से पुकारा जाने वाला सीमा स्थित भू- भाग भी था, शत्रु के हाथ में चला गया था। राजधानी तथा कश्मीर घाटी के लिए गंभीर संकट की आशंका खड़ी हो गई थी। महाराजा ने इस संकटपूर्ण स्थिति में भारत उपनिवेश से जुड़ने का प्रस्ताव रखा और सैनिक मदद की मांग की। भारत सरकार ने राज्य के सम्मिलन को स्वीकार किया और इस तरह बाद में कश्मीर, भारत का अभिन्न अंग हो गया। लेकिन यह सब नियम- कायदे में बांधने का तब वक़्त नहीं था। यह काम बाद पर छोड़ दिया गया और तुरंत विमान और सैनिक मदद भिजवाई गई। दिल्ली में एक बैठक हुई जिसमें पंडित नेहरू, सरदार पटेल, प्रतिरक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह, प्रमुख सेनापति जनरल बुकर, थल सेना प्रमुख जनरल रसैल और बख्शी गुलाम मुहम्मद शेख (शेख अब्दुल्ला के प्रमुख सहयोगी) शामिल थे। बैठक की अध्यक्षता लॉर्ड माउण्टबेटन ने की। चर्चा के बाद सेनापति जीत के प्रति सशंकित लगे। लंबी चुप्पी के बाद कोने से भारी आवाज़ में सरदार पटेल बोले- सेनापतियों, सुन लीजिए- साधन- सामग्री हो या न हो, भारत सरकार से जो बन पड़ेगा, आपकी मदद करेगी लेकिन कश्मीर किसी भी कीमत पर हाथ से जाना नहीं चाहिए। सेनापति आपत्ति रखना चाहते थे, लेकिन सरदार ने वक्त नहीं दिया। वे खड़े हो गए और चलते- चलते बोले- सुबह रसद समेत विमान आपको तैयार मिलेंगे। एक मिनट का भी विलंब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अंत में भारतीय सेना की जीत हुई और पाकिस्तानियों को मार भगाया गया। पाकिस्तान का तात्कालिक आक्रमण जब विफल हो गया तो लॉर्ड माउण्टबेटन ने मोहम्मद अली जिन्ना के सामने एक फ़ार्मूला रखा जिसमें कहा गया था कि ” जिस राज्य का राजा अपनी प्रजा की बहुसंख्यक जाति का न हो और वह राज्य ऐसे उपनिवेश के साथ न जुड़ा हो, जिसकी बहुसंख्यक जाति वही हो जो राज्य की हो, तो वह राज्य किस उपनिवेश के साथ जुड़े, यह प्रश्न निष्पक्ष मतदान द्वारा जानी गई वहाँ की प्रजा की इच्छा से निर्णीत होगा।” भारत सरकार ऐसा वचन देने को राज़ी हो गई। शर्त यह थी कि जनता का मत जानने के लिए मतदान संयुक्त राष्ट्र संघ के मार्गदर्शन में होगा, लेकिन जिन्ना इस फ़ार्मूले पर भी राज़ी नहीं हुए। जब जिन्ना नहीं पसीजे तो भारत सरकार को पाकिस्तान के निंदनीय आक्रमण से लंबे समय तक जूझना पड़ा। अंत में लॉर्ड माउण्टबेटन के अनुरोध पर इस मामले में संयुक्त राष्ट्र संघ की मध्यस्थता की विनती का निर्णय लिया गया और 1 जनवरी 1948 को विधिवत शिकायत की गई। सरदार वल्लभ भाई पटेल व्यक्तिगत रूप से इससे सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि राष्ट्र संघ मामले को लंबा खींचेगा और फिर भी शिकायत रखनी ही है तो भारत वादी की बजाय प्रतिवादी बने। लेकिन बाद में यह मामला नेहरूजी के अधीन विदेश मंत्रालय में चला गया। गोपाल स्वामी अय्यंगार उनके परामर्शदाता थे। सरदार बाक़ी मामलों की तरह इस बार भी नेहरूजी का सम्मान करते हुए चुप हो गए। बाद में पाकिस्तान ने इस बात से साफ़ इनकार कर दिया कि कश्मीर पर हुए आक्रमण में उसका सीधा हाथ था। हालांकि राष्ट्र संघ के कमीशन ने पाकिस्तान की पोल खोल दी और कश्मीर में बचे पाक सैनिकों को तुरंत हटाने का प्रस्ताव रखा। परंतु तत्पश्चात भारत सरकार नेहरूजी की अगुआई में झुक गई। युद्ध विराम, युद्ध विराम रेखा और 5 जनवरी 1949 का वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया जिसमें पाकिस्तान के प्रति झुकाव था। इससे भारत- पाकिस्तान बराबरी के दर्जे पर खड़े हो गए। राष्ट्र संघ कमीशन का 13 अगस्त 1948 का वह प्रस्ताव जो पाकिस्तान को अपराधी बता रहा था, मंद पड़ गया। कश्मीर पर पाकिस्तान के सीधे आक्रमण का मूलभूत प्रश्न धुँधला हो गया और जनमत संग्रह की बात पर अधिक भार दे दिया गया। इसके पूर्व की एक महत्वपूर्ण बात यह भी थी कि एक बार भारतीय मंडल ने निर्णय लिया कि जब तक पाकिस्तान महत्वपूर्ण समझौतों को नहीं मान लेता, रोकड़ बाक़ी का उसका हिस्सा रुपए 55 करोड़ उसे लौटाया नहीं जाएगा। लेकिन बाद में कुछ हस्तक्षेपों की वजह से यह रक़म भी उसे जनवरी 1948 में ही लौटा दी गई। सरदार पटेल का मत था कि यह रक़म मिलते ही पाकिस्तान अपनी रक्षा शक्ति बढ़ाएगा, और वही हुआ भी। आख़िरकार, शेख़ अब्दुल्ला कश्मीर के शासक हो गए। 24 दिसंबर 1947 को मेहरचंद महाजन द्वारा सरदार पटेल को लिखा गया पत्र (देखिए अनुवाद) बताता है कि आपातकालीन प्रशासन के मुखिया बनते ही शेख़ अब्दुल्ला किस तरह तानाशाही पर उतर आए थे। कुछ ही दिन बाद शेख़ सरकारी ही नहीं, व्यक्तिगत तौर पर भी महाराजा का तीव्र विरोध करने लगे। शेख़ ने मैसूर योजना की यह शर्त मानने से साफ़ इनकार कर दिया कि दीवान की हैसियत से महाराजा का प्रतिनिधि, मंत्रिमंडल की बैठक की अध्यक्षता करेगा। केंद्रीय सरकार के मंत्री और नेहरूजी के विश्वस्त गोपाल स्वामी अय्यंगार पर महाराजा और शेख अब्दुल्ला के बीच दोनों पक्षों को स्वीकार्य समझौता करवाने की ज़िम्मेदारी डाली गई। उसी तरह जैसे नरसिंहराव सरकार में आंतरिक सुरक्षा मंत्री राजेश पायलट को कश्मीर का प्रभारी बनाया गया था। परिणाम यह हुआ था कि केंद्रीय गृहमंत्री और पायलट में अन बन हो गई। नेहरूजी और अय्यंगार की जोड़ी से तब सरदार पटेल भी असहमत थे, लेकिन सरदार ने मतभेदों को उजागर नहीं होने दिया। अय्यंगार ने जब महाराजा और शेख़ के बीच समझौते की कोशिश की तो उन्हें लगा कि शेख़ अब महाराजा की शर्तों को मानने वाले नहीं हैं। इसलिए उन्होंने उल्टे, महाराजा को ही झुकाने पर अपने सारे प्रयास केंद्रित कर दिए। अय्यंगार ने सारे काम शेख़ की पसंद के किए। अय्यंगार ने फ़ार्मूला रखा कि शेख़ के प्रधानमंत्रित्व में एक संयुक्त अंतरिम सरकार की रचना की जाए और उसके अन्य मंत्री शेख़ की सलाह से ही पसंद किए जाएँ तथा संपूर्ण सत्ता और अधिकार इस सरकार को सौंप दिए जाएँ। चूँकि इस व्यवस्था में भी शेख़, महाराजा के वैधानिक सलाहकार मेहरचंद महाजन को बर्दाश्त करने पर राज़ी नहीं थे, इसलिये अय्यंगार ने महाजन की सेवाएं समाप्त करने का भी प्रस्ताव रख दिया। भारत सरकार द्वारा सुझाई गई मैसूर योजना का बिलकुल उल्टा यह प्रस्ताव महाराजा को नहीं भाया। उन्होंने इसका विरोध किया। ख़ासकर, महाजन को हटाने के प्रस्ताव का। महाराजा, महाजन को अपना विश्वस्त मानते थे, लेकिन अय्यंगार ने महाराजा से कहा कि हर दृष्टिकोण से उनके द्वारा सुझाया गया प्रस्ताव ठीक है और इसमें यह अत्यावश्यक है कि उस अंतरिम सरकार के प्रति आप राज्य के वैधानिक मुखिया (मात्र) के रूप में व्यवहार करें और उसकी सलाह से ही कार्य करें। सरदार पटेल चूँकि देसी राज्य मामलों के प्रभारी थे और इसका असर बाक़ी राज्यों के राजा- महाराजाओं पर पड़ना लाज़िमी था, इसलिए वे कश्मीर के महाराजा हरिसिंह की इस छीछालेदर से बेहद ख़फ़ा थे। लेकिन वे फिर भी चुप रहे। विवाद को बढ़ाना नहीं चाहते थे पटेल। शेख अब्दुल्ला के शासन में किस तरह सांप्रदायिकता फैली? ख़ुद शेख कितने सांप्रदायिक थे? उन्होंने किस तरह राज्य के हिन्दुओं पर अत्याचार और मुस्लिमों को प्रश्रय दिया, इसका कच्चा चिट्ठा महाराजा के वैधानिक सलाहकार मेहरचंद महाजन द्वारा सरदार पटेल को लिखे गए उस पत्र में मिलता है जिसमें अब्दुल्ला के शासन की ख़ामियाँ बिन्दुवार गिनाई गई हैं।महाजन के पत्र का अनुवाद यहाँ जैसा का तैसा दिया जा रहा है । रोकड़- बाक़ी का जो धन पाकिस्तान को दिया जाना था, उससे पाकिस्तान तुरंत अपनी रक्षा शक्ति न बढ़ा सके, इसलिए उसे रक़म के भुगतान में देरी करने के लिए सरदार पटेल किस तरह प्रयासरत थे, इसका अंदाज़ा उनके द्वारा 12 दिसंबर 1947 को तब के वित्त मामलों के मंत्री (अंतरिम सरकार) आरके षणनुखम चेट्टी को लिखे गए पत्र (देखें चेट्टी को सरदार का पत्र ) से लगाया जा सकता है। लेकिन सरदार के पत्र और अन्य पत्र जो उपलब्ध हैं, से लगता है कि नेहरूजी ने अन्य मंत्रियों के सहयोग से सरदार के मत के ख़िलाफ़ मामलों में भी अपने ही मत को चलाया और उस मत को चलन में लाने के लिए बार- बार पटेल की लोकप्रियता, दृढ़ता और वर्चस्व का दोहन किया। विवाद न बढ़े और नेहरूजी के सम्मान में कमी न आए इसलिए पटेल न चाहते हुए भी चुपचाप नेहरूजी के इंगित कार्यों को मौन स्वीकृति देते गए। जब कश्मीर के बारे में शेख अब्दुल्ला का एकतरफ़ा समर्थन करने वाली गोपालस्वामी अय्यंगार की योजना को मानने से महाराजा हरिसिंह ने इनकार कर दिया और स्वयं अय्यंगार तथा नेहरूजी भी महाराजा को न मना पाए तो वे मदद के लिए पटेल के पास आए। पटेल ने न चाहते हुए भी अपने निजी सचिव बी शंकर को कश्मीर भेजकर महाराजा को अय्यंगार प्रस्ताव मानने के लिए राज़ी कर लिया। फलस्वरूप 5 मार्च 1948 की घोषणा द्वारा अब्दुल्ला मंत्रिमंडल को जम्मू- कश्मीर राज्य की अधिकृत सरकार के रूप में स्वीकार कर लिया गया और महाराजा के वैधानिक सलाहकार मेहरचंद महाजन की छुट्टी कर दी गई। शेख की महत्वाकांक्षा देखिए कि इससे भी उन्हें संतोष नहीं हुआ और उन्होंने महाराजा पर आरोप लगाया कि वे मुसलमानों की हत्या को प्रोत्साहन देते हैं। महाराजा के खिलाफ जांच बैठा दी गई। हालांकि भारत सरकार के आग्रह पर जांच बाद में उठा ली गई, लेकिन शेख ने महाराजा का विरोध जारी रखा। शेख की महत्वाकांक्षा बढ़ती जा रही थी। सरदार पटेल ने कहा कि एक जीत के बाद शेख दूसरी जीत पर अड़ गए हैं, यह ठीक नहीं है। नेहरूजी शेख की हर महत्वाकांक्षा पूरी करते गए और पंडित नेहरू तथा गोपाल स्वामी अय्यंगार को अचानक यह प्रतीति हुई कि वर्तमान नाजुक और संकटपूर्ण स्थिति में महाराजा राज्य में न रहें तो चलेगा (बहुसंख्यक मुस्लिमों की दृष्टि से) पर शेख अब्दुल्ला की राज्य में उपस्थिति और उनका निर्बाध शासन अनिवार्य है। इस बात पर नेहरूजी के मत से सरदार पटेल कतई सहमत नहीं थे और काफी हद तक पटेल गुस्सा हो गए। फिर भी नेहरूजी ने अपनी वही नीति अपनाई। पटेल को, महाराजा को राज्य छोड़ने के लिए मनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। पटेल ने एक बार फिर अपने निजी सचिव को कश्मीर भेजा और महाराजा मान गए। महाराजा ने बंबई में एक कोठी बनवाई और राज्य छोड़कर वहीं रहने तथा अपने पुत्र, युवराज कर्णसिंह को राज्य प्रतिनिधि बनाना स्वीकार कर लिया। जब महाराजा हरिसिंह ने कश्मीर छोड़ दिया तो नेहरूजी के समर्थन से और शेख अब्दुल्ला के मंत्रिमंडल से विचार- विमर्श के बाद गोपाल स्वामी अय्यंगार ने अनुच्छेद 370 की योजना बनवाई, जो भारत के साथ कश्मीर राज्य के संबंध की व्याख्या करता है। भारत के साथ कश्मीर राज्य के संबंध से कुछ विद्वान यह तात्पर्य निकालते हैं कि यदि इस अनुच्छेद को हटाया जाता है तो कश्मीर स्वयं ही भारत से अलग हो जाएगा। खैर, जब इस अनुच्छेद को संविधान सभा में रखा गया तब नेहरूजी अमेरिका में थे लेकिन फार्मूले के मसौदे पर पहले ही उनकी स्वीकृति ले ली गई थी। सरदार पटेल के पत्र बताते हैं कि इस संबंध में उनसे कोई परामर्श नहीं किया गया। संविधान सभा में इस अनुच्छेद का खुद कांग्रेस ने ही जोरदार, बल्कि हिंसक ढंग से विरोध किया था क्योंकि यह अनुच्छेद कश्मीर राज्य को एक विशेष दर्जा प्रदान करता है। सैद्धांतिक रूप से कांग्रेस पार्टी की यह राय थी कि कश्मीर भी उन्ही मूलभूत व्यवस्थाओं अर्थात शर्तों के आधार पर संविधान को स्वीकार करे, जिन शर्तों पर अन्य राज्यों ने उसे स्वीकार किया है। पार्टी ने इस शर्त का विशेष रूप से जबर्दस्त विरोध किया कि संविधानगत मूलभूत धाराएं यानी बुनियादी अधिकारों संबंधी धाराएं कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होंगी। गोपाल स्वामी अय्यंगार इस संबंध में पार्टी के अन्य नेताओं को समझा नहीं सके थे या उन्हें इस पृष्ठभूमि की प्रतीति नहीं करा सके थे। हमेशा की तरह उन्होंने फिर सरदार पटेल के हस्तक्षेप की मांग की। पटेल चाहते थे कि नेहरूजी की अनुपस्थिति में ऐसा कुछ न किया जाए जो उन्हें नीचा दिखाने वाला प्रतीत हो, इसलिए नेहरूजी की अनुपस्थिति में पटेल ने कांग्रेस पार्टी को अपना रवैया बदलने के लिए समझाने का कार्य हाथ में लिया। उनके हस्तक्षेप के बाद संविधान सभा में इस अनुच्छेद की बहुत ज्यादा चर्चा नहीं हुई, न इसका विरोध हुआ। यह कार्य सरदार ने अपने स्वभाव के कितने विरुद्ध जाकर किया, यह इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि एक समय जब गोपाल स्वामी अय्यंगार ने पार्टी द्वारा स्वीकृत अनुच्छेद के मसौदे में कुछ फेरबदल करना चाहा तो पटेल ने 16 अक्टूबर 1949 को अय्यंगार को एक कड़ा पत्र लिखा और कहा- (उन्हीं के शब्दों में) ‘ मैं देखता हूं कि मूल मसौदे में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन हो गए हैं। खासकर, बुनियादी अधिकारों तथा राज्य के नीति- निदेशक सिद्धांतों की व्यवहार्यता के संबंध में। आप स्वयं भी इस असंगति को समझ सकते हैं कि एक ओर तो जम्मू- कश्मीर राज्य भारत का एक भाग बनता है और दूसरी ओर वह इनमें से किसी भी व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता। हमारी पार्टी ने जब स्वयं शेख साहब की उपस्थिति में संपूर्ण व्यवस्था कर ली है, तब मैं इसमें किसी परिवर्तन को बिलकुल पसंद नहीं करता। जब कभी शेख साहब उत्तरदायित्व से भागना चाहते हैं, तब वे हमेशा जनता के प्रति अपने कर्तव्य के नाम पर हमारे प्रतिकूल हो जाते हैं। बेशक, भारत के प्रति या भारत सरकार के प्रति उनका कोई कर्तव्य नहीं है, अथवा व्यक्तिगत आधार पर आपके प्रति और प्रधानमंत्री के प्रति भी उनका कोई कर्तव्य नहीं है, जो उन्हें अनुकूल बताने के लिए सीमा से सर्वथा बाहर चले गए हैं और अब भी जा रहे हैं। बहरहाल, इन परिस्थितियों में मेरी किसी स्वीकृति का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यदि आपको लगता है कि ऐसा करना ठीक है तो आप इसके साथ आगे बढ़ सकते हैं। अनुच्छेद 370 में जम्मू- कश्मीर राज्य संबंधी अस्थाई उपबंध किए गए हैं। ये अब तक के सर्वाधिक विवादित उपबंध रहे हैं। इस अनुच्छेद के ज़रिए कश्मीर के संबंध में भारतीय संसद को काफ़ी हद तक लगाम दी गई है। वे कुछ मामले जो कश्मीर के भारत में विलय के समय भारत डोमिनियन (उपनिवेश) के तहत आ गए थे या जिनका संविलियन पत्र में हवाला है, उन्हें छोड़कर अन्य किसी भी मामले में संसद अपना क़ानून या आदेश इस राज्य पर लागू नहीं कर सकती। यह राष्ट्रपति द्वारा उस राज्य के सत्ता प्रमुख से चर्चा के बाद ( महाराजा की 5 मार्च 1948 की उद्घोषणा के अधीन) उसकी सहमति पर ही संभव है। पहले यह सहमति कश्मीर मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करने वाले महाराजा, फिर सदरे रियासत से ली जाती थी। अब संशोधन कर संदरे रियासत की जगह राज्यपाल कर दिया गया है। इस अनुच्छेद का वह प्रावधान हमेशा विवादास्पद रहा, जिसमें कश्मीर के बहुसंख्यक मुसलमानों के हमेशा बहुसंख्यक ही बने रहने का इंतज़ाम है। प्रावधान यह है कि भारत के किसी भी क्षेत्र का नागरिक कश्मीर में जाकर न तो स्थाई तौर पर रह सकता, न कोई अचल संपत्ति ख़रीद सकता और न ही स्थाई तौर पर कोई व्यापार कर सकता। जबकि देश के बाक़ी हिस्सों में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। है भी तो केवल ज़मीन ख़रीदी के मामले में। समय- समय पर यह सुझाव आता रहा कि कश्मीर के मुस्लिमों को देश के बाक़ी राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में भेजकर वहाँ हिन्दुओं या अन्य को बसा दिया जाए अथवा कश्मीरी लोगों के वहीं रहते हुए भी राज्य को हिन्दू बहुल बना दिया जाए तो पाकिस्तान की तरफ़ से खड़ी होने वाली समस्याओं का हमेशा के लिए निदान हो जाएगा और जनमत वाला मुद्दा भी हमें नहीं डरा सकेगा। भारतीय जनता पार्टी हमेशा से इस सुझाव की पक्षधर रही है, लेकिन इस अनुच्छेद को अब तक कोई नहीं छेड़ पाया। कभी शेष राज्यों के मुस्लिम वोटों की वजह से, तो कभी अन्य राजनीतिक दबाव की वजह से। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 के पक्षपाती प्रावधानों को हटाने के लिए आंदोलन छेड़ा था। उन्होंने नारा दिया था- एक देश में दो प्रधान, दो विधान, दो निशान, नहीं चलेंगे। कश्मीर में प्रवेश के लिए शेष देश के लोगों को पहले परमिट की ज़रूरत होती थी। इस परमिट व्यवस्था को डॉ. मुखर्जी ने ही तोड़ा था। डॉ. मुखर्जी के निधन के बाद भाजपा ने भी धारा 370 को हटाने के लिए समय- समय पर आंदोलन किए, लेकिन स्थिति अब तक जस की तस है। स्वयं भाजपा केंद्र की सत्ता पर क़ाबिज़ होकर भी अब से पहले यह सब नहीं कर पायी। यहाँ यह उल्लेख ज़रूरी है कि भारत में कुछ अन्य राज्य भी हैं जो अपने जनजातीय स्वरूप और प्रथाओं को बनाए रखने के लिए संसद की शक्ति को सीमित करते हैं। धारा 371 (क) में प्रावधान है कि जब तक निम्नलिखित मुद्दों पर नगालैण्ड विधानसभा अपनी ओर से कोई संकल्प पारित नहीं करती, तब तक संसद का कोई भी कानून नगालैण्ड पर लागू नहीं किया जाएगा ।

 

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