यज्ञोपवीत से स्वास्थ्य लाभ

यज्ञोपवीत बचाए अनेक रोगों से

यज्ञोपवीत भारतीय संस्कृति का मौलिक सूत्र है। इसका संबंध हमारे आध्यात्मिक ,आधिदैविक तथा आधिभौतिक जीवन से है। यज्ञोपवीत अर्थात जनेऊ को “यज्ञ सूत्र” तथा “ब्रह्म सूत्र” भी कहा जाता है। बाएं कंधे पर स्थित जनेऊ देवभाव की तथा दाएं कंधे पर स्थित पितृभाव की घोतक है। मनुष्यत्व से देवत्व प्राप्त करने हेतु यज्ञोपवीत सशक्त साधन है।

यज्ञोपवीत का हमारे स्वास्थ्य से बहुत गहरा सम्बन्ध है। हृदय, आँतों तथा फेफड़ों की क्रियाओं पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ता है। लंदन के ‘क्वीन एलिजाबेथ चिल्ड्रन हॉस्पिटल’ के भारतीय मूल के डॉ एस आर सक्सेना के अनुसार हिंदुओं द्वारा मल मूत्र त्याग के समय कान पर जनेऊ लपेटने का वैज्ञानिक आधार है ऐसा करने से आँतों की अपकर्षण गति बढ़ती है, जिससे कब्ज दूर होती है तथा मूत्राशय की मांसपेशियों का संकोच वेग के साथ होता है कान के पास की नसें दबाने से बढ़े हुए रक्तचाप को नियंत्रित तथा कष्ट से होने वाली श्वास क्रियाओं को सामान्य किया जा सकता है।

कान पर लपेटी गयी जनेऊ मल मूत्र त्याग के बाद अशुद्ध हाथों को तुरंत साफ करने हेतु प्रेरित करती है। यज्ञोपवीत धारण करने के बाद बार-बार हाथ पैर तथा मुख की सफाई करते रहने से बहुत से संक्रामक रोग नहीं होते। योग शास्त्रों में स्मरण शक्ति तथा नेत्र ज्योति बढ़ाने के लिए ‘कर्णपीड़ासन’ का बहुत महत्व है इस आसन में घुटनों द्वारा कान पर दबाव डाला जाता है। कान पर कसकर जनेऊ लपेटने से ‘कर्णपीड़ासन’ के सभी लाभों की प्राप्ति होती है।

इटली में ‘बारी विश्वविद्यालय’ के न्यूरो सर्जन प्रो. एनारीका पिरंजेली ने यह सिद्ध किया है की कान के मूल में चारों तरफ दबाव डालने से हृदय मजबूत होता है। पिरंजेली ने हिंदुओं द्वारा कान पर लपेटी गयी जनेऊ को हृदय रोगों से बचाने वाली ढाल की संज्ञा दी है।

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