(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : अमेरिका ने इजराइल के प्रति अपनी नीतियों में बड़ा बदलाव किया है। ट्रम्प प्रशासन ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय की नीति को पलटते हुए इजराइल के वेस्ट बैंक और पूर्व येरुशलम पर कब्जे को मान्यता दी है। रक्षा मंत्री माइक पोम्पियो ने सोमवार को कहा कि अमेरिका अब वेस्ट बैंक में इजराइली बस्तियों को अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के तौर पर नहीं देखता। पोम्पियो ने कहा कि वेस्ट बैंक हमेशा से इजराइल और फिलिस्तीन के बीच विवाद का कारण रहा है। इन बस्तियों को बार-बार अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कहने का कोई फायदा नहीं हुआ। इसकी वजह से शांति की कोशिशें भी नहीं हुई हैं। इजराइल ने अमेरिका के इस फैसले का स्वागत किया है। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजमिन नेतन्याहू ने कहा कि यह ऐतिहासिक गलती को सही करने जैसा है। उन्होंने अन्य देशों से भी इस फैसले को मानने के लिए कहा। हालांकि, फिलिस्तीन की तरफ से वेस्ट बैंक के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे साएब एरेकत ने कहा, “अमेरिका का फैसला वैश्विक स्थिरता, सुरक्षा और शांति के लिए खतरा है। इस तरह का फैसला अंतरराष्ट्रीय कानून को जंगल के कानून से बदलने जैसा है।” वेस्ट बैंक में इजराइली बस्तियों का विवाद इजराइल और फिलिस्तीन के बीच विवाद का सबसे बड़ा कारण है। 1967 के तीसरे अरब-इजराइल युद्ध में इजराइल ने अपने तीन पड़ोसी देशों सीरिया, मिस्र और जॉर्डन को हराया था। इसके बाद उसने वेस्ट बैंक और पूर्वी येरुशलम के बड़े हिस्से पर कब्जा कर 140 बस्तियां बना दी थीं। यहां अभी करीब 6 लाख यहूदी रहते हैं। इन बस्तियों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध करार दिया जाता है, हालांकि इजराइल ने इन्हें अपना हिस्सा मानता है। फिलिस्तीनी नेता लंबे समय से इन बस्तियों को हटाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि वेस्ट बैंक में यहूदियों के रहने से उनका भविष्य में आजाद फिलिस्तीन का सपना पूरा नहीं हो पाएगा। इसको लेकर फिलीस्तीन ने कई बार अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद मांगी है। 1978 में अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने फैसला लिया था कि वेस्ट बैंक में इजराइली बस्तियां अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन हैं। 1981 में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने कार्टर प्रशासन के फैसले को गलत मानते हुए कहा था कि उन्हें नहीं लगता कि बस्तियों पर इजराइल का शुरुआत से कोई अधिकार नहीं। इसके बाद अमेरिका ने अपनी स्थिति में बदलाव करते हुए इजराइल के कब्जे को अवैध की जगह अनुचित माना था। इसके जरिए अमेरिका ने इजराइल को लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों से भी बचाया है। 2016 के अंत में संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव लाया गया, जिसमें इजराइल के अवैध कब्जों को खत्म करने की मांग की गई। तब तत्कालीन ओबामा प्रशासन ने इजराइल के समर्थन की नीति को बदलते हुए इस प्रस्ताव पर वीटो करने से इनकार कर दिया। हालांकि, ट्रम्प ने राष्ट्रपति बनने के बाद से इजराइल को दोबारा समर्थन पहुंचाया। पोम्पियो के मुताबिक, ट्रम्प प्रशासन ने सभी विवादों को समझने के बाद रीगन के 38 साल पहले वाले फैसले को सबसे सही पाया।