5 फरवरी: आज ही हुई थी चौरीचौरा क्रांति, लेकिन गांधी ने ही उन क्रान्तिकारियो को ठहरा था गलत !

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : नई दिल्ली। चौरी-चौरा थाने में आग लगा दी थी। ये एक ऐसा प्रतिरोध था जिसकी कल्पना तक अंग्रेजो ने नहीं की थी । इस घटना में थानाध्यक्ष समेत 23 पुलिसकर्मी जिंदा जल गए थे। इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत ने 19 को फांसी और 14 को काला पानी की सजा सनाई थी। आजाद भारत में आज उन्हीं सपूतों का सिर कहीं और धड़ कहीं और पडा हुआ है। उनकी याद में बना शहीद स्मारक अपनों की लापरवाही से उपेक्षा का शिकार है। चौरी-चौरा उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जिले में एक गांव हैं। जो ब्रिटिश शासन काल में कपड़ों और अन्य वस्तुओं की बड़ी मंडी हुआ करता था। अंग्रेजी शासन के समय गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी। जिसका उद्देश्य अंग्रेजी शासन का विरोध करना था। इस आन्दोलन के दौरान देशवासी ब्रिटिश उपाधियों, सरकारी स्कूलों और अन्य वस्तुओं का त्याग कर रहे थे और वहाँ के स्थानीय बाजार में भी भयंकर विरोध हो रहा था। इस विरोध प्रदर्शन के चलते 2 फरवरी 1922 को पुलिस ने दो क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया था।

अपने साथियों की गिरफ़्तारी का विरोध करने के लिए करीब 4 हजार आन्दोलनकरियों ने थाने के सामने ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रदर्शन और नारेबाजी की। इस प्रदर्शन को रोकने के लिए पुलिस ने हवाई फायरिंग की और जब प्रदर्शनकारी नहीं माने तो उन लोगों पर ओपन फायर किया गया। जिसके कारण तीन प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए। इसी दौरान पुलिसकर्मियों की गोलिया खत्म हो गई और प्रदर्शनकारियों को उग्र होता देख वह थाने में ही छिप गए। अपने साथी क्रांतिकारियों की मौत से आक्रोशित क्रांतिकारियों ने थाना घेरकर उसमे आग लगा दी। इस घटना में कुल 23 ब्रिटिश पुलिसकर्मियों की जलकर मौत हो गई थी। यह घटना जब गांधी को पता चली तो वो थाने में आग लगाने वाले तमाम क्रांतिकरियो से बहुत नाराज हुए थे । उन्होंने उनके लिए कठोर शब्दों का उपयोग किया था और इतना ही नहीं , चौरी चौरा के क्रांतिकारियों को ही दोषी बताते हुए उन्होंने अपना असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इसी के चलते चौरी चौरा के वो बलिदानी समाज की नजर में उपेक्षित हो गये और उनको ऐसे देखा जाने लगा जैसे गांधी का कहा न मान कर उन्होंने देश का कोई बहुत बड़ा नुक्सान कर दिया हो । 9 जनवरी 1923 के दिन चौरी-चौरी कांड के लिए 172 लोगों को आरोपी बनाया गया था।

आज क्रांति के उस दिवस पर उन तमाम ज्ञात अज्ञात क्रांतिकारियों को बारंबार नमन करते हुए NLN परिवार उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है और साथ ही सवाल करता है उन तमाम बुद्धिजीवियों से कि उन्हें उस समय अकेला क्यों छोड़ दिया गया था ?

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