(न्यूज़लाइवनाउ-Saudi Arabia) साल 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच “स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट” नाम का सुरक्षा समझौता हुआ था। इस समझौते के अनुसार यदि किसी एक देश पर हमला होता है तो दूसरा देश उसकी रक्षा में सहयोग करेगा। यानी किसी भी बाहरी आक्रमण को दोनों देशों के खिलाफ हमला माना जा सकता है।
इसी कारण जब ईरान ने क्षेत्र में हमले शुरू किए तो यह सवाल उठा कि क्या पाकिस्तान सऊदी अरब की सैन्य मदद के लिए मैदान में उतरेगा।
2026 में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर हमलों के बाद मध्य-पूर्व में संघर्ष तेज हो गया। इसके जवाब में ईरान ने कई जगहों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिनमें सऊदी अरब के ठिकाने और तेल प्रतिष्ठान भी निशाने पर आए। इन घटनाओं के बाद सऊदी अरब ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की और सहयोगी देशों के साथ संपर्क बढ़ाया।
सऊदी ने पाकिस्तान से सहयोग पर की चर्चा
तनाव बढ़ने के बीच सऊदी अरब के रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर से मुलाकात कर सुरक्षा सहयोग पर चर्चा की। माना जा रहा है कि यह बैठक ईरान से बढ़ते खतरे को देखते हुए हुई थी।
इससे यह अटकलें भी लगीं कि यदि हालात बिगड़ते हैं तो पाकिस्तान सऊदी अरब के समर्थन में खड़ा हो सकता है। हालांकि समझौता मौजूद है, लेकिन पाकिस्तान ने अभी तक सीधे तौर पर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई नहीं की है। इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं:
- क्षेत्रीय संतुलन की नीति: पाकिस्तान सऊदी अरब का करीबी सहयोगी है, लेकिन उसके ईरान के साथ भी सीमावर्ती और धार्मिक-राजनीतिक संबंध हैं। इसलिए वह किसी एक पक्ष के खिलाफ खुलकर कदम उठाने से बच रहा है।
- युद्ध में सीधे शामिल होने का जोखिम: ईरान के साथ संघर्ष में उतरना पूरे क्षेत्र को बड़े युद्ध में धकेल सकता है। पाकिस्तान इस तरह के सैन्य टकराव से बचना चाहता है।
- घरेलू और आर्थिक दबाव: पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति कमजोर है और वह बड़े युद्ध में शामिल होने की क्षमता नहीं रखता।
- समझौते की सीमाएँ: विशेषज्ञों का कहना है कि रक्षा समझौते का मतलब हर परिस्थिति में सैन्य हस्तक्षेप नहीं होता। यह समझौता मुख्य रूप से सुरक्षा सहयोग और रणनीतिक समर्थन तक सीमित भी हो सकता है।
हालांकि सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच मजबूत रक्षा समझौता है, लेकिन मौजूदा हालात में पाकिस्तान संतुलित नीति अपनाते हुए सीधे युद्ध में कूदने से बच रहा है। वह कूटनीतिक समर्थन और सुरक्षा सहयोग तक सीमित रहकर स्थिति पर नजर बनाए हुए है।