(न्यूज़लाइवनाउ-Iran) मध्य-पूर्व में ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच चल रहा सैन्य टकराव लगातार तेज होता जा रहा है। पिछले लगभग छह दिनों से दोनों पक्षों के बीच मिसाइल और ड्रोन हमलों का सिलसिला जारी है, जिससे पूरे क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात बन गए हैं। इस संघर्ष को अमेरिका ने “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” नाम दिया है।
अमेरिका-इज़राइल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान के कई सैन्य ठिकानों, कमांड सेंटरों और मिसाइल लॉन्च साइटों पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू किए। इन हमलों का मकसद ईरान की मिसाइल और परमाणु क्षमताओं को कमजोर करना बताया गया।
रिपोर्टों के अनुसार इस हमले में ईरान के कई महत्वपूर्ण सैन्य अधिकारी मारे गए और कुछ प्रमुख ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचा। इसी दौरान ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई के मारे जाने की खबरें भी सामने आईं, हालांकि कुछ रिपोर्टों में इसकी पुष्टि विवादित बताई गई।
अमेरिका और इज़राइल के हमलों के बाद ईरान ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी। ईरान ने इज़राइल और खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों की ओर कई बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन दागे। इन हमलों में कुछ मिसाइलों को एयर-डिफेंस सिस्टम ने रोक लिया, जबकि कुछ लक्ष्यों के पास गिरने की खबरें आईं। ईरान की इस जवाबी कार्रवाई से पूरे पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति और ज्यादा तनावपूर्ण हो गई है।
लेबनान में हिज़्बुल्लाह की एंट्री
ईरान समर्थित संगठन हिज़्बुल्लाह ने भी इस संघर्ष में हिस्सा ले लिया है। उसने उत्तरी इज़राइल की ओर कई रॉकेट दागे। इसके जवाब में इज़राइली सेना ने लेबनान की राजधानी बेरूत और दक्षिणी इलाकों में हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर हवाई हमले किए।
इन हमलों में लेबनान में दर्जनों लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने की खबर है। बड़ी संख्या में नागरिकों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित इलाकों की ओर जाना पड़ा।
संघर्ष के फैलने के कारण पूरे मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ गया है। कुछ देशों ने अपने नागरिकों को क्षेत्र छोड़ने की सलाह दी है। ईरान की कार्रवाई के बाद खाड़ी देशों और अमेरिकी ठिकानों पर भी सुरक्षा अलर्ट जारी कर दिया गया है।
तेल व्यापार पर भी असर
इस युद्ध का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। ईरान ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास गतिविधियां बढ़ा दी हैं, जो दुनिया के तेल परिवहन का प्रमुख मार्ग माना जाता है। इससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी दबाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष इसी तरह बढ़ता रहा तो यह केवल ईरान और इज़राइल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व को बड़े युद्ध की ओर धकेल सकता है। कई देश पहले ही इस टकराव को लेकर चिंता जता चुके हैं।