(न्यूज़लाइवनाउ-India) लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने निर्णय लिया है कि सदन की बैठकों में वह तब तक भाग नहीं लेंगे, जब तक उनके ख़िलाफ़ विपक्ष द्वारा दाख़िल किए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा और औपचारिक निर्णय नहीं हो जाता।
118-120 से अधिक सांसदों के हस्ताक्षर
यह निर्णय अभ्यास नियमों के ज़रूरी होने के बावजूद उनकी तरफ़ से स्वेच्छा से लिया गया कदम है। विरोध या सरकार किसी भी स्तर पर उन्हें मनाने की कोशिश करें, बिरला ने कह दिया है कि वे फिलहाल लोकसभा की कार्यवाही में उपस्थिति नहीं देंगे। विपक्षी दलों ने लोकसभा स्पीकर के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस मंगलवार को लोकसभा सचिवालय में सौंप दिया है। इस नोटिस पर लगभग 118-120 से अधिक सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जिसमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और अन्य शामिल हैं, जबकि टीएमसी सांसदों ने फिलहाल हस्ताक्षर नहीं किए।
विपक्ष का आरोप है कि ओम बिरला ने सदन में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया, जैसे कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने की अनुमति नहीं दी गई और कुछ विपक्षी सांसदों की निलंबन जैसी कार्रवाई की गई — जिसके चलते यह प्रस्ताव लाया गया है।
अविश्वास प्रस्ताव संविधान के अनुच्छेद 94(सी) और लोकसभा के नियम 94(c) के तहत पेश किया जाता है। अगर इसे सदन में स्वीकार किया जाता है, तो इससे स्पीकर को पद से हटाने का प्रस्ताव आगे बढ़ेगा, लेकिन यह तभी संभव होगा जब कम से कम 14 दिनों की नोटिस अवधि पूरी हो जाए और बाद में बहुमत से प्रस्ताव पास हो।
राजनीतिक माहौल और प्रतिक्रिया
यह मामला संसद के बजट सत्र में जारी तनाव का हिस्सा बन गया है, जहां सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध बना हुआ है। विपक्ष का कहना है कि स्पीकर ने सदन संचालन में निष्पक्षता नहीं दिखाई, जबकि सरकार का कहना है कि विपक्ष के पास कोई ठोस मुद्दा नहीं है और आंदोलन केवल राजनीतिक सुर्खियों के लिए है।
ओम बिरला ने लोकसभा की बैठकों में शामिल नहीं होने का फ़ैसला किया है जब तक अविश्वास प्रस्ताव पर निर्णय नहीं आता। विपक्ष ने विपक्षी सांसदों की एक बड़ी संख्या के साथ स्पीकर के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है। कारण में आरोप हैं पक्षपातपूर्ण सदन संचालन और नेता प्रतिपक्ष को बोलने से रोकना। अब संसदीय नियमों के तहत प्रस्ताव की जांच और चालान प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
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