यूरोप में महंगाई के खिलाफ जनआक्रोश, फ्रांस-इटली समेत कई देशों में प्रदर्शन; आगजनी और लूटपाट से मचा हड़कंप

(न्यूज़लाइवनाउ-Europe) यूरोप के कई देशों में बढ़ती महंगाई, महंगे मकान, ईंधन की कीमतों और कमजोर होती क्रय शक्ति के खिलाफ लोगों का गुस्सा सड़कों पर दिखाई दे रहा है। 17 अक्टूबर 2026 को फ्रांस, इटली, बेल्जियम और पुर्तगाल में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ, जबकि कुछ इलाकों में आगजनी, दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं सामने आईं।

फ्रांस में सबसे ज्यादा बिगड़े हालात, 1,200 से अधिक लोग गिरफ्तार

इन प्रदर्शनों में फ्रांस सबसे अधिक प्रभावित देशों में रहा। वहां महंगाई के साथ-साथ सार्वजनिक सेवाओं में गिरावट और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों ने भी लोगों की नाराजगी बढ़ाई। शुरुआत में स्कूली छात्रों की समस्याओं को लेकर शुरू हुए विरोध में बाद में श्रमिक संगठनों और अन्य समूहों ने भी हिस्सा लिया।

फ्रांस के गृह मंत्रालय के अनुसार, देशभर में करीब 5.5 लाख लोग प्रदर्शन में शामिल हुए, जबकि श्रमिक संगठन CGT ने यह संख्या लगभग 8 लाख बताई। विरोध के दौरान हालात कई शहरों में हिंसक हो गए। प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू के मुताबिक, घटनाओं के सिलसिले में 1,200 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया और करीब 150 पुलिसकर्मी घायल हुए

पेरिस समेत कई शहरों में आगजनी और दुकानों में तोड़फोड़

फ्रांस की राजधानी पेरिस के अलावा मार्सेई, लियोन, बोर्डो, लिले, नांत और लिमोज जैसे शहरों में भी हिंसा की घटनाएं दर्ज की गईं। कुछ प्रदर्शनकारियों ने वाहनों को आग के हवाले कर दिया और दुकानों के शीशे तोड़कर सामान लूट लिया। सुपरमार्केट, कपड़ों की दुकानों, इलेक्ट्रॉनिक्स स्टोर और महंगे ब्रांड के शोरूम भी निशाने पर आए।लिमोज में ऐतिहासिक टाउन हॉल आगजनी के कारण बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया, जबकि लियोन में पर्यटक कार्यालय को आग लगा दी गई। मार्सेई और लिले में भी सार्वजनिक इमारतों में तोड़फोड़ की खबरें सामने आईं।

भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। इस दौरान पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर भी सवाल उठे।

इटली में भी पुलिस से भिड़े प्रदर्शनकारी

इटली के मिलान और बोलोन्या में भी बढ़ती जीवन-यापन लागत के खिलाफ निकाले गए मार्च के दौरान तनाव देखने को मिला। मिलान में प्रदर्शन की शुरुआत शांतिपूर्ण तरीके से हुई, लेकिन बाद में कुछ नकाबपोश लोगों ने पुलिस पर पत्थर और अन्य वस्तुएं फेंकीं। कुछ स्थानों पर अवरोधक जलाए गए और दुकानों में लूटपाट की गई।भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को आंसू गैस और पानी की बौछारों का सहारा लेना पड़ा। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस दौरान कम से कम दो पुलिसकर्मी घायल हुए और करीब 50 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने हिंसा की आलोचना करते हुए कहा कि प्रदर्शन करना लोगों का अधिकार है, लेकिन शहरों को आग के हवाले करना स्वीकार नहीं किया जा सकता। मिलान के मेयर ने भी लोगों की आर्थिक परेशानियों को जायज बताते हुए हिंसक गतिविधियों को अनुचित करार दिया।

बेल्जियम और पुर्तगाल में भी सरकारों के खिलाफ नाराजगी

बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में विश्वविद्यालयों की फीस और छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर पहले से विरोध चल रहा था। ताजा प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। लीज शहर में भी इसी तरह की कार्रवाई की गई।

वहीं, पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में हजारों लोगों ने महंगाई, कम वेतन और आवास संकट के खिलाफ मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि बढ़ते किराये और मकानों की ऊंची कीमतों के कारण आम लोगों के लिए शहरों में रहना मुश्किल होता जा रहा है। पुर्तगाल में वर्ष 2017 के बाद से मकानों की कीमतों में दोगुने से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है।

क्या दूसरे यूरोपीय देशों में भी फैल सकता है विरोध?

विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोप में बढ़ती आर्थिक परेशानियां आने वाले समय में और व्यापक असंतोष को जन्म दे सकती हैं। महंगाई, शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधनों की कमी, आवास की बढ़ती लागत और युवाओं के भविष्य को लेकर अनिश्चितता लोगों की नाराजगी के प्रमुख कारण हैं।फिलहाल फ्रांस, इटली, बेल्जियम और पुर्तगाल में हुए प्रदर्शन किसी एक साझा संगठन के नेतृत्व में नहीं हुए, लेकिन उनकी वजहों में कई समानताएं हैं। विशेषज्ञों ने जर्मनी, ग्रीस और ऑस्ट्रिया जैसे देशों में भी विरोध बढ़ने की संभावना जताई है।

यूरोप में आगामी महीनों के दौरान होने वाले चुनावों को देखते हुए यह जनअसंतोष राजनीतिक बहस का अहम मुद्दा बन सकता है। सरकारों के सामने अब आर्थिक दबाव कम करने, सार्वजनिक सेवाओं में सुधार लाने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती है।

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