(न्यूज़लाइवनाउ-Pakistan) पाकिस्तान इस समय केवल राजनीतिक खींचतान से नहीं, बल्कि कई इलाकों में एक साथ उभर रहे विद्रोह, आतंकी हिंसा और जनआंदोलनों से जूझ रहा है। बलूचिस्तान में अलगाववादी संगठन BLA की गतिविधियां तेज हैं, खैबर पख्तूनख्वा में TTP की चुनौती बनी हुई है और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर यानी PoK में स्थानीय लोगों का विरोध अब गंभीर टकराव का रूप ले चुका है। ऐसे हालात ने देश की सेना और सरकार के सामने एक साथ कई मोर्चे खोल दिए हैं।
बलूचिस्तान में BLA की चुनौती
पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान में लंबे समय से अलगाववादी आंदोलन चल रहा है। Balochistan Liberation Army यानी BLA पाकिस्तानी सरकार और सुरक्षा बलों के खिलाफ सशस्त्र अभियान चलाता रहा है। संगठन का आरोप है कि प्रांत के प्राकृतिक संसाधनों का पर्याप्त लाभ स्थानीय आबादी को नहीं मिलता और केंद्र सरकार वहां राजनीतिक तथा आर्थिक नियंत्रण बनाए रखना चाहती है।
2026 की शुरुआत में बलूचिस्तान में बड़े पैमाने पर समन्वित हमले हुए थे। इन घटनाओं में सैन्य ठिकानों, पुलिस प्रतिष्ठानों और अन्य सरकारी परिसरों को निशाना बनाया गया। इसके बाद पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने व्यापक अभियान चलाया।
BLA की सक्रियता पाकिस्तान के लिए इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इससे केवल सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित नहीं होती, बल्कि चीन से जुड़े आर्थिक और बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट भी संवेदनशील हो जाते हैं।
खैबर पख्तूनख्वा में TTP का दबाव
दूसरी तरफ अफगानिस्तान से लगे खैबर पख्तूनख्वा में Tehreek-e-Taliban Pakistan यानी TTP पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगातार बड़ी चुनौती बना हुआ है। इस क्षेत्र में सुरक्षा बलों, पुलिस और सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमलों की घटनाएं सामने आती रही हैं।
TTP की गतिविधियों के कारण इस्लामाबाद और काबुल के बीच तनाव भी बढ़ा है। पाकिस्तान लंबे समय से अफगानिस्तान की धरती पर TTP के ठिकाने होने का आरोप लगाता रहा है। फरवरी 2026 में बाजौर में सुरक्षा चौकी पर हुए आत्मघाती हमले और उसके बाद गोलीबारी में सुरक्षा कर्मियों और एक बच्चे की मौत हुई थी। पाकिस्तानी अधिकारियों ने इस हमले के लिए TTP को जिम्मेदार ठहराया था।इसका मतलब है कि सेना को पश्चिमी सीमा पर भी लगातार सुरक्षा दबाव झेलना पड़ रहा है।
PoK में जनता बनाम सरकार
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हालात का स्वरूप कुछ अलग है। यहां विरोध का मुख्य आधार स्थानीय अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक परेशानियां और इस्लामाबाद के हस्तक्षेप को लेकर असंतोष है।Joint Awami Action Committee यानी JAAC के नेतृत्व में हुए आंदोलनों ने पाकिस्तान सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
प्रदर्शनकारियों की मांगों में स्थानीय स्तर पर अधिक अधिकार और राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव जैसी बातें शामिल हैं। हालिया हिंसक घटनाओं में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों की जान गई।
रिपोर्टों के मुताबिक, कई इलाकों में कर्फ्यू, इंटरनेट प्रतिबंध और मीडिया की आवाजाही पर पाबंदियां लगाई गईं। इससे सरकार की चिंता का अंदाजा लगाया जा सकता है कि आंदोलन कहीं दूसरे हिस्सों तक न फैल जाए।
सेना पर बढ़ता दबाव
पाकिस्तान की राजनीति में सेना की भूमिका पहले से ही बेहद प्रभावशाली रही है। मौजूदा परिस्थितियों में सेना को एक साथ आतंकवाद, अलगाववाद और जन असंतोष से निपटना पड़ रहा है।बलूचिस्तान में BLA, खैबर पख्तूनख्वा में TTP और PoK में JAAC समर्थित आंदोलन—इन तीनों की प्रकृति अलग है। फिर भी इनका एक साझा असर है: इनसे राज्य की पकड़ और प्रशासनिक क्षमता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
यही वजह है कि पाकिस्तान के लिए मौजूदा संकट केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गया है। यह राजनीतिक स्थिरता, संघीय ढांचे और सेना की विश्वसनीयता से भी जुड़ता जा रहा है।
कट्टरपंथी संगठनों पर भी सख्ती
पाकिस्तान में सेना ने कुछ कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों के खिलाफ भी सख्त रुख अपनाया है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर के नेतृत्व में ऐसे संगठनों पर कार्रवाई तेज हुई है। इसका एक कारण देश के भीतर बढ़ती उग्रवादी हिंसा और दूसरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की छवि तथा पश्चिमी देशों के साथ संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश माना जा रहा है।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान में कई धार्मिक संगठनों का अतीत में राजनीतिक प्रभाव रहा है। अब उनके खिलाफ कार्रवाई सेना की रणनीति में बदलाव का संकेत देती है।
क्या पाकिस्तान बिखरते मोर्चों से घिर रहा है?
मौजूदा स्थिति को देखें तो पाकिस्तान के सामने तीन अलग-अलग तरह के संकट दिखाई देते हैं। बलूचिस्तान में पहचान और संसाधनों से जुड़ा अलगाववादी संघर्ष है, खैबर पख्तूनख्वा में धार्मिक उग्रवाद और आतंकवाद की चुनौती है, जबकि PoK में राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों को लेकर जन असंतोष बढ़ रहा है।
इन सभी क्षेत्रों में सेना की मौजूदगी और कार्रवाई बढ़ रही है। लेकिन केवल सैन्य बल के इस्तेमाल से इन समस्याओं का स्थायी समाधान मुश्किल दिखाई देता है। जब तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक असमानता, स्थानीय अधिकार और सुरक्षा से जुड़े सवालों का समाधान नहीं होता, तब तक असंतोष के नए केंद्र उभरने की आशंका बनी रहेगी।फिलहाल पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह एक साथ इतने अलग-अलग संकटों को किस तरह नियंत्रित करता है। यदि बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और PoK में अस्थिरता लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा—तीनों पर पड़ सकता है।