भारत ने रूस के साथ किया एस-400 मिसाइलें ख़रीदने का करार, क्यों भड़के ट्रंप ?

अाइए जानते हैं कि आखिर भारत-रूस के इस समझौते के बाद अमेरिका का पारा क्‍यों चढ़ गया

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : रूस के साथ एस-400 समझौते पर अमेरिका ने अपनी सख्‍त नाराजगी जताई है। उसने इस करार का कड़े शब्‍दों में निंदा किया है। अमेरिका ने चेतावनी देते हुए कहा है कि भारत को प्रतिबंध के लिए तैयार रहना चाहिए। एेसे में नाराज अमेरिका को मनाना भारतीय विदेश नीति के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती होगी। अाइए जानते हैं कि आखिर भारत-रूस के इस समझौते के बाद अमेरिका का पारा क्‍यों चढ़ गया। बदले हालात में अब भारतीय विदेश नीति के समक्ष क्‍या चुनौतियां होंगी। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद क्‍यों मधुर हुए अमेरिका-भारत के रिश्‍ते। इसके साथ यह भी जानेंगे कि भारत के लिए क्‍या है रूस की अहमियत। उदारीकरण के बाद भारत के बड़े बाजार और मजबूत आर्थिक तंत्र ने किस तरह से देश का बढ़ाया गौरव।रूस के साथ एस-400 करार के बाद नाराज अमेरिका को मनाना भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी चुनौती होगी। हालांकि, रूस के साथ हुए इस सौदे को लेकर भारत ने शुरू से यह साफ किया कि यह मिसाइल उसके क्षे‍त्रीय सामरिक समीकरण के संतुलन के लिए है। चीन और पाकिस्‍तान के साथ भारत के तल्‍ख होते रिश्‍तों के बीच यह सौदा भारत के लिए काफी अहम है। यह देश की सामरिक जरूरत है। रूस के साथ यह करार तब और अहम हो जाता है, जब इस क्षेत्र में चीन और पाकिस्‍तान गठबंधन न केवल दक्षिण एशिया का सामरिक संतुलन प्रभावित कर रहा है, बल्कि इसका असर पूरे एशियाई क्षेत्र में है। भारत के पास रूसी मिसाइल आने से इस क्षेत्र का सामरिक संतुलन कायम रहेगा। भारत इन्‍हीं तर्कों के साथ अमेरिका को मनाने के लिए उतरेगा। हालांकि, यह भविष्‍य बताएगा कि ऊंट किस करवट बैठेगा। इन तर्कों से कितना सहमत होगा अमेरिका।भारत और अमेरिकी संबंधों में ‘टू प्लस टू वार्ता’ एक मील का पत्‍थर है। गत महीने दोनों देशों के बीच पहली ‘टू प्लस टू’ वार्ता के बाद दोनों देश महत्वपूर्ण रक्षा करार पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत भारतीय सेना को अमेरिका से महत्वपूर्ण और एन्क्रिप्टिड (कूट रूप से सुरक्षित) रक्षा प्रौद्योगिकी हासिल की थी। ‘टू प्लस टू’ वार्ता के बाद भारत और अमेरिका काफी निकट आए हैं। यह करार अमेरिका से मंगाए गए रक्षा प्लेटफॉर्मों पर उच्च सुरक्षा वाले अमेरिकी संचार उपकरणों को लगाने की भी इजाजत देगा। लेकिन रूस के साथ हुए एस-400 के लिए हुए करार के बाद अब यह देखना दिलचस्‍प होगा कि क्‍या इसका असर ‘टू प्लस टू वार्ता’ पर पड़ेगा। भारत की कोशिश होगी कि ‘टू प्लस टू वार्ता’ को आगे बढ़ाए। दरअसल, शीत युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया में शक्ति संतुलन के समीकरण बदले हैं। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस और चीन की निकटता से भारत ने अपनी सामरिक रणनीति में बदलाव किया है। शीत युद्ध के दौरान भारत अपनी सामरिक जरूरतों के लिए काफी हद तक सोवियत संघ (रूस) पर निर्भर था। लेकिन दुनिया के बदले हालात में अब सामरिक और अन्‍य जरूरतों के लिए भारत की निर्भरता केवल रूस तक सीमित नहीं रही। वह अमेरिका के भी काफी करीब है। यही कारण है कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद शायद ही कोई अमेरिकी राष्‍ट्रपति हो, जिसने भारत का यात्रा न की हो। इसके पीछे भारत की आर्थिक ताकत ही है, जिसने दुनिया के कोतवाल को बेहतर संबंध बनाने के लिए विवश किया। देश में उदारीकरण के बाद भारत के बड़ा बाजार और मजबूत आर्थिक व्‍यवस्‍था ने सबको अपनी ओर आकर्षित किया है। भारत के प्रति अमेरिकी दिलचस्‍पी का यह एक बड़ा फैक्‍टर रहा है। यही कारण रहा है कि तमाम विराधों के बावजूद यहां भारत-अमेरिकी रिश्‍ताें पर असर नहीं पड़ा है।अमेरिकी चुनावों में रूस के कथित हस्तक्षेप के चलते अमेरिका ने उसके खिलाफ काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शन्स एक्ट (सीएएटीएसए कानून) के तहत प्रतिबंध लगाया है, जिसमें रूस के रक्षा या खुफिया प्रतिष्ठानों से हथियारों की खरीद-फरोख्त पर तकनीकी रूप से प्रतिबंध लगाने का प्रवाधान है। इस नियम के तहत यानी जो अमेरिका के दुश्मन देशों से हथियार खरीदेगा उस पर अमेरिका अपने नियमों के तहत प्रतिबंध लगाएगा। इसके अलावा जो देश ऐसे प्रतिबंधों के बावजूद रूस से हथियार खरीदते हैं तो उसे अमेरिका से भी नई और अत्याधुनिक हथियारों की खरीद पर रोक लगाए जाने का प्रावधान है। ऐसे में भारत और अमेरिका के बीच सैन्य रिश्तों में खटास आने की पूरी आशंका है।

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