– सूत्रों के मुताबिक हॉन्गकॉन्ग के साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने सोमवार को अपनी रिपोर्ट में चीन की इस मंशा का खुलासा किया है। इसके मुताबिक ये प्रस्तावित सुरंग दुनिया के सबसे ऊंचे पठार के कई हिस्सों के नीचे से होकर निकलेगी, ये हिस्से कई झरनों के जरिये आपस में जुड़े हुए हैं। सुरंग चीन के सबसे बड़े एडिमिनिस्ट्रेटिव डिवीजन (शिनजियांग) के विशाल रेगिस्तान और सूखे घास के मैदानों को पानी मुहैया कराएगी।– यारलुंग तसांगपो (ब्रह्मपुत्र) नदी का पानी भारत और बांग्लादेश भी इस्तेमाल करते हैं। इसलिए नई दिल्ली पहले ही इसे लेकर बीजिंग से चिंता जता चुका है। यूं तो यह नदी चीन और भारत दोनों में बहती है, लेकिन चीन बरसों से इसके पानी पर अपना अधिकार जता रहा है। वह ब्रह्मपुत्र नदी पर पहले ही कई बांध बना चुका है और नए भी बना रहा है और अब वह इसका पानी सुरंग के जरिए शिनजियांग में ले जाना चाहता है।
– ब्रह्मपुत्र के बहाव को बदलकर इसका पानी इस्तेमाल करने के चीन के इरादे को भारत अक्सर बाइलेट्रल बातचीत में उठाता रहा है और बीजिंग द्वारा बनाए जा रहे बांधों का विरोध करता रहा है।
– भारत में एनवायर्नमेंटलिस्ट्स का एक तबका ऐसा भी है, जो उत्तराखंड में 2016 में आई बाढ़ के लिए चीन को जिम्मेदार मानता है। इनका मानना है कि चीन द्वारा किए जा रहे कामों ने कुदरत के नियमों का वॉयलेशन किया है, जिसका भुगतान भारत को उत्तराखंड में हजारों जानें देकर चुकाना पड़ा। एनवायर्नमेंटलिस्ट्स का ये भी कहना है कि चीन की सुरंग से हिमालयी क्षेत्र को गंभीर नुकसान होगा।
– भारत के एतराज पर चीन का कहना है कि उसने बांध रिवर प्रोजेक्ट्स को चलाने के लिए बनाए हैं न कि पानी को स्टोर करने के लिए।
– भारत-चीन के बीच कोई वाटर ट्रीटी नहीं है। हालांकि दोनों देशों ने बॉर्डर के दोनों ओर बहने वाली नदियों को लेकर एक एक्सपर्ट लेवल मैकेनिज्म (ELM) बना रखा है। अक्टूबर 2013 में दोनों देशों की सरकारों ने नदियों पर कोऑपरेशन को मजबूती देने के लिए एक एमओयू पर साइन भी किए थे।