भ्रष्टाचार, अतिक्रमण व प्रदूषण की मार के कारण सिकुड़ रही है डल झील

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : नई दिल्ली। बर्फ से लदे पहाड़ों की तलहटी में स्थित डल झील भ्रष्टाचार, अतिक्रमण व प्रदूषण की मार के कारण सिकुड़ रही है। झील के नाम पर सियासी दलों ने खूब सुर्खियां बटोरीं, करीब 40 साल में एक हजार करोड़ से अधिक खर्च कर दिए, लेकिन डल की किस्मत बदलने की तमाम योजनाएं कचरे व गाद में ही दबकर रह गईं। कभी 50 किलोमीटर के दायरे में कही जाने वाली डल अब सिमट रही है। साथ ही इस झील की किस्मत बदलने के लिए अब अतिरिक्त 1500 करोड़ रुपये की मांग की जा रही है। झील संरक्षण में दो बड़ी समस्याएं बताई जा रही हैं। पहली इसमें आसपास के इलाकों से आना वाला सीवेज और दूसरी डल में सदियों से रहने वाले परिवारों का पुनर्वास। निजी एजेंसी की रिपोर्ट बताती है कि 334 वर्ग किलोमीटर में फैले जलग्रहण क्षेत्र में सबसे पहले बचाव के उपाय जरूरी हैं। हिमपात, बारिश व अन्य कारणों से जलग्रहण क्षेत्र में अकसर मृदा क्षरण होता है, जो गाद के रूप में झील में समा जाता है। बीते साल राज्य प्रदूषण बोर्ड ने बताया था कि श्रीनगर में रोज पैदा होने 201 मिलियन लीटर सीवेज में मात्र 53.8 मिलियन लीटर को एसटीपी साफ कर पाते हैं। 73 फीसद सीधा डल समेत अन्य जलस्रोतों में गिरता है। लावडा (झील एवं जलमार्ग विकास प्राधिकरण) में जन जागरूकता अधिकारी तारिक मलिक का कहना है कि मौजूदा एसटीपी की क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है। श्रीनगर का बड़ा हिस्सा बरारीनंबल एसटीपी के साथ जोड़ा जाना बाकी है। झील में बसे लोगों के दूसरी जगह पुनर्वास की योजना सिरे नहीं चढ़ रही है। जून 1986 में राज्य सरकार ने झील क्षेत्र में किसी भी तरह के निर्माण पर पाबंदी लगाई थी। वर्ष 2002 में राज्य के उच्च न्यायालय ने भी आदेश दिया कि झील के किनारे स्थित फोरशोर रोड के मध्य से 200 मीटर की दूरी तक कोई निर्माण न हो।

बीते वर्ष उच्च न्यायालय ने झील पर अतिक्रमण के खिलाफ 16 साल पुरानी याचिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि 2002 से अदालत की निगरानी और 400 करोड़ से ज्यादा खर्च किए जाने के बावजूद राज्य में संबंधित अधिकारी और प्रशासनिक अमला आशाजनक परिणाम देने में असमर्थ नजर आता है। अदालत ने तो यहां तक कहा कि अगर समयबद्ध उपाय नहीं किए तो डल किस्से-कहानियों में सिमट जाएगी। डल के संरक्षण का जिम्मा संभालने वाले लावडा में सेवाएं दे चुके हायड्रॉलिक इंजीनियरिंग विशेषज्ञ एजाज रसूल ने बताया कि झील के संरक्षण की कवायद 1978 में शुरू हुई थी। तत्कालीन राज्य सरकार ने न्यूजीलैंड की कंपनी ईनैक्स कंसोर्टियम को झील में प्रदूषण के अध्ययन का जिम्मा सौंपा था। इनैक्स की रिपोर्ट पर शहरी पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग (यूईईडी) ने झील को सुधारने का जिम्मा लिया। 1997 तक यूईईडी ने 71.60 करोड़ विभिन्न योजनाओं पर खर्च किए। फिर केंद्र से वित्तीय मदद का आग्रह किया गया। एनएलसीपी (राष्ट्रीय झील संरक्षण योजना) के तहत डल के संरक्षण की योजना बनी। केंद्र ने 298 करोड़ का अनुदान दिया। अन्य विदेशी संगठनों से वित्तीय मदद ली गई। स्वायत संस्था लावडा वर्ष 1997 में बनाई। इस समय झील क्षेत्र में 58 छोटी-बड़ी बस्तियों में 60 हजार लोग रहते हैं। वर्ष 2007 में लावडा ने डल में रहने वालों के पुनर्वास के लिए रक्ख अरथ बेमिना में कॉलोनी की योजना पर काम शुरू किया। यह परियोजना तीन साल में 416.72 करोड़ की लागत से पूरी होनी थी। वर्ष 2018 के अंत तक लावडा प्रस्तावित 10500 आवासीय भूखंडों में मात्र 2600 ही आवंटित कर पाया है। इनमें कई लोग वापस आ गए हैं। यह कहा जाता है कि डल कभी 50 से 75 वर्ग किलोमीटर में फैली थी। तारिक मलिक ने कहा कि हमारे पास इसका कोई पक्का रिकॉर्ड नहीं है।
19वीं सदी में कश्मीर आए अंग्रेज सरकार के सेटलमेंट कमिश्नर वाल्टर लारेंस ने अपनी किताब में बताया है कि झील 25.86 वर्ग किलोमीटर में है और इसमें 18.21 वर्ग किलोमीटर में पानी और 7.65 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा झील में बने टापुओं और बस्तियों का है। राज्य सतर्कता आयोग भी कई मामलों की जांच कर रहा है। आयोग के मुताबिक डल झील के संरक्षण के लिए वर्ष 2002 से आवंटित 759 करोड़ की राशि का दुरुपयोग हुआ है। लावडा इसे नकारते हुए कहता है कि झील संरक्षण का प्रत्यक्ष परिणाम नजर न आने के कारण लोगों के मन में घोटाले का वहम है। लावडा के वित्तीय सलाहकार हारुन अहमद के मुताबिक, 759 करोड़ सिर्फ डल की सफाई के लिए नहीं थे। इसका 65 फीसद तो डल में रहने वालों के पुनर्वास पर खर्च हुआ है, जबकि शेष 35 फीसद ही डल संरक्षण पर खर्च किए गए हैं। हमने झील के जलग्रहण क्षेत्र के संरक्षण, मृदा क्षरण रोकने, निर्माण पर प्रतिबंध को प्रभावी बनाने जैसे कार्यों पर भी पैसा खर्च किया है। इसके अलावा लावडा के अधिकारियों व कर्मियों के वेतन, झील की सफाई के लिए मशीनरी व अन्य साजो सामान भी तो खरीदा है। हमें झील संरक्षण के दूसरे चरण के लिए 1500 करोड़ की जरूरत है। इसकी योजना जल्द ही सरकार को सौंपी जाएगी।

पर्यावरणविद रफी रज्जाकी कहते हैं, डल झील का संरक्षण श्रीनगर की सियासत से भी जुड़ा है। शहर में आठ विधानसभा क्षेत्रों में चार इसके साथ जुड़े हैं। इसलिए झील को नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों का राजनीतिक संरक्षण से इन्कार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा झील के भीतरी इलाकों में अधिसंख्य आबादी समुदाय विशेष की है और अगर उसे हटाए जाने पर कोई सीधी बात करेगा तो उस पर सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाने का आरोप लगेगा। फिर सियासत शुरू हो जाएगी, ऐसा हुआ भी है। डल झील पर हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका में पैरवी कर रहे एडवोकेट जफर अहमद शाह ने कहा कि डल की दुर्दशा के लिए किसी एक को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। बहुत सी सरकारी एजेंसियों और वर्गों की लापरवाही शामिल है। जनवरी माह में सेना ने डल झील की सफाई के लिए अभियान चलाया तो उस पर भी सियासत शुरू हो गई। श्रीनगर के मेयर जुनैद अजीम ने इस पर एतराज जताया और कहा कि निगम ने कहीं भी सेना से मदद के लिए नहीं कहा है। उधर, डिप्टी मेयर शेख इमरान कह रहे थे कि झील हमारा गहना है। इसे बचाने के लिए सभी को सहयोग करना है। सेना व अन्य सुरक्षा एजेंसियों को मदद करनी चाहिए। इस मुहिम पर कश्मीर के अन्य संगठनों ने भी सवाल उठाए। नतीजा डल के लिए शुरू हुई सेना की मुहिम सियासी गलियों में खोकर रह गई।

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