सर्जिकल स्ट्राइक वर्षगाठ : दो साल पहले सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक की कहानी

पिछले दिनों मानव संसाधन विकास मंत्रालय की अनुशंसा पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने एक सुझावात्मक पत्र करीब 900 विश्वविद्यालयों और 38 हजार कॉलेजों को जारी किया, जिसमें 29 सितंबर को ‘सर्जिकल स्ट्राइक डे’ के रूप में विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में आयोजित करने की बात कही गई

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ)  : पिछले दिनों मानव संसाधन विकास मंत्रालय की अनुशंसा पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने एक सुझावात्मक पत्र करीब 900 विश्वविद्यालयों और 38 हजार कॉलेजों को जारी किया, जिसमें 29 सितंबर को ‘सर्जिकल स्ट्राइक डे’ के रूप में विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में आयोजित करने की बात कही गई। इस घोषणा के साथ ही इस पर राजनीति शुरू हो गई। पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री ने केंद्र सरकार की हर पहल का विरोध करने की ठान ली है और उन्होंने इसे चुनावी षड्यंत्र बताया। चटर्जी ने यहां तक कह दिया कि केंद्र सरकार शहीदों के बलिदान पर राजनीति कर रही है। वहीं जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति ने इस दिवस को धूमधाम से मनाने की बात कही।मानव संसाधन विकास मंत्रालय की घोषणा के बाद रक्षा मंत्रालय ने भी ‘इंडिया गेट’ पर एक विशेष झांकी निकालने की बात कही। अब यह विषय पूरी तरह राजनीतिक अखाड़े का हिस्सा बन गया। इस घोषणा के बाद राहुल गांधी अपने पसंदीदा शिक्षाविदों के साथ दिल्ली के सीरीफोर्ट सभागार में भाषण देते हैं और आश्वासन देते हैं कि उनकी सरकार आई तो बेतरतीब शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से चुस्त-दुरुस्त कर दिया जाएगा।यहां पर दो प्रश्न हैं। पहला, सर्जिकल स्ट्राइक पर राजनीति क्यों? दूसरा, क्या शिक्षण संस्थाओं में सुरक्षा संबंधी मसलों को राजनीतिक आईने से देखा जाना चाहिए? पहले प्रश्न की बात की जाए तो कई बातें सामने आती हैं। सर्जिकल स्ट्राइक पाकिस्तान के विरुद्ध था। उड़ी में हुए आतंकी हमले के बाद यह सब किया गया। हमारे 14 सैनिकों पर देर रात घात लगाकर हमला किया गया था। जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा ने इसे सुनियोजित रूप से अंजाम दिया था, जिसे पाकिस्तानी सेना की ओर से पूरी मदद मुहैया कराई गई थी।भारत ने पहला हमला अचानक नहीं किया। प्रधानमंत्री ने हर पहलू और उससे पैदा होने वाले परिणामों को देखते हुए इजाजत दी थी। यह भी सच है कि भारत का यह पहला सर्जिकल स्ट्राइक नहीं था। ऐसी कवायद पहले भी हुई है। म्यांमार के भीतर भी हुआ था, लेकिन 29 सितंबर 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक कई मायनों में अभी तक के आक्रमण से भिन्न थी। यह अभ्यास भारतीय सामरिक मानसिकता का अभिन्न अंग बन गया। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इसकी खूब चर्चा होती रही। भारत ने पाकिस्तान के साथ युद्ध का एक नया रास्ता खोज लिया।भारत-पाकिस्तान संबंध आण्विक विस्फोट के बाद पूरी तरह से बदल गए। परंपरागत भारतीय श्रेष्ठता को पाकिस्तान आण्विक धमकियों से डराने लगा। हर मुसीबत की घड़ी में आण्विक हथियारों के प्रयोग की धमकी देने लगा। इस परिवर्तन का फायदा पाकिस्तान अपनी घुसपैठ को बढ़ाने में और सीमावर्ती इलाकों में भारतीय सेना पर आक्रमण करने में लगाने लगा। भारत का आण्विक सिद्धांत भी पाकिस्तान से अलग है। भारत प्रथम प्रयोग का विरोधी रहा है। इसलिए संघर्ष की स्थिति में भी भारत ने कभी भी आण्विक हथियारों की धमकी नहीं दी है। जबकि पाकिस्तान प्रथम प्रयोग की बात को नहीं मानता अर्थात परिस्थिति ऐसी बनती है तो पाकिस्तान आण्विक हथियारों के प्रयोग से गुरेज नहीं करेगा। उड़ी आक्रमण से पहले भी कई हमले पाकिस्तान की तरफ से किए जा चुके थे।ऐसे माहौल में सर्जिकल स्ट्राइक के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा था। प्रश्न यहां पर यह भी है कि इस विशेष दिन की याद किसलिए? भारत पिछले कई वर्षों से आतंकवाद से पीड़ित है। आतंकवाद की धुंध पाकिस्तान से उठती है। बीते वर्षों में भारत ने अनेक मोर्चों पर तरक्की हासिल की है और उसकी गिनती महत्वपूर्ण देशों के बीच की जाने लगी है। आर्थिक, सैनिक और अन्य मापदंडों पर इसकी अहमियत बढ़ती जा रही है। युवाओं का सबसे बड़ा समूह भारत में रहता है। युवाओं का सबसे बड़ा तबका विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के प्रांगण में प्रशिक्षण ले रहे होते हैं। शिक्षा के साथ राष्ट्रीयता का पुट देश को मजबूत बनाता है।दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह रहा है कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान का आतंकी हमला और तेज हुआ है, क्योंकि पिछले हमले को पाकिस्तान सर्जिकल स्ट्राइक मानने से इन्कार करता रहा है। पूरी दुनिया जानती है कि भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक के द्वारा पाकिस्तान के सात से अधिक कैंपों को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया था। स्थिति पुन: ऐसी बन रही है कि भारत दोबारा हमला करेगा, चूंकि अंतरराष्ट्रीय कानून की नजरों में भी यह प्रयास सबसे बेहतर विकल्प है। भारत आण्विक हथियारों की धमकी नहीं दे सकता। ऐसे हालात में पाकिस्तान के निरंतर आतंकी हमले का का जवाब सर्जिकल स्ट्राइक ही हो सकता है।अगर इस दिवस को पूरी तैयारी और संवेदना के साथ मनाया जाता है तो न केवल राष्ट्रीय मनोबल ऊंचा होगा, बल्कि सैनिकों का उत्साह भी बढ़ेगा। चूंकि चुनावी माहौल है इसलिए हर निर्णय राजनीति का अखाड़ा बन जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला राजनीति से परे रहना चाहिए। विशेषकर ऐसी स्थिति में जब पाकिस्तान की चयनित सरकार और सेना के बीच फर्क बिल्कुल खत्म हो गया हो। पाकिस्तान केवल अपनी कमजोरी की वजह से भारत के साथ वार्ता की शुरुआत करना चाहता है। भारत का पक्ष स्पष्ट है कि वार्ता और बम दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। भारत हर तरह से सर्जिकल स्ट्राइक की पुनरावृत्ति की तैयारी में है, और पाकिस्तान को यह संशय भी है कि भारत ऐसा कुछ कर सकता है। इसलिए भी हम सभी भारतीयों के बीच सुरक्षा के इस अहम मसले पर सोच एक होनी चाहिए।

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