नेपाल में बाढ़ के बाद शवों का अंबार, सामूहिक दफन की तैयारी; तबाही से पहले चीन से मांगा गया था ग्लेशियर का डेटा
(न्यूज़लाइवनाउ-Nepal) नेपाल में आई भीषण बाढ़ और हिमालयी आपदा के बाद हालात लगातार भयावह बने हुए हैं। कई इलाकों में पानी और मलबे के साथ बहकर आए शवों की संख्या इतनी अधिक हो गई है कि अस्पतालों और शवगृहों में जगह कम पड़ने लगी है। बड़ी संख्या में शवों की पहचान नहीं हो पाई है और उनके सड़ने की स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने अस्थायी रूप से सामूहिक दफन की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी की है।
चितवन में शवों को संभालना बना बड़ी चुनौती
बाढ़ के बाद नदी और मलबे से बड़ी संख्या में शव बरामद किए जा रहे हैं। चितवन जिले में अकेले सैकड़ों शव पहुंचने के बाद प्रशासन के सामने उन्हें सुरक्षित रखने की गंभीर समस्या खड़ी हो गई। शवों की पहचान के लिए डीएनए नमूने लेने, तस्वीरें खींचने और अन्य पहचान संबंधी जानकारी दर्ज करने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
इसके बाद जिन शवों की पहचान नहीं हो पा रही है और जिन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखना संभव नहीं है, उन्हें अस्थायी रूप से दफनाने का फैसला किया गया है। प्रशासन का कहना है कि यह कदम स्वास्थ्य संबंधी खतरे और शवों के तेजी से खराब होने की स्थिति को देखते हुए उठाया जा रहा है। हालांकि, इस फैसले को लेकर कुछ परिवारों और स्थानीय लोगों ने आपत्ति भी जताई है। उनका कहना है कि अंतिम संस्कार की धार्मिक परंपराओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
तबाही से पहले नेपाल ने चीन से मांगी थी अहम जानकारी
इस विनाशकारी आपदा के बाद नेपाल और चीन के बीच ग्लेशियर तथा बाढ़ संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान का मुद्दा भी चर्चा में आ गया है। रिपोर्टों के अनुसार, नेपाल ने आपदा से पहले चीन के साथ हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियरों, संभावित खतरों और शुरुआती चेतावनी से जुड़ी जानकारी साझा करने पर बातचीत की थी।
नेपाल की चिंता यह थी कि सीमा पार ऊंचे हिमालयी इलाकों में होने वाली किसी बड़ी भूगर्भीय या हिमनदीय घटना की जानकारी समय रहते मिल जाए, ताकि निचले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को पहले चेतावनी दी जा सके। लेकिन नेपाल का कहना है कि उसे पर्याप्त और उपयोगी डेटा नहीं मिल पाया। वहीं चीन ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा है कि कठिन और दुर्गम हिमालयी भूभाग में ग्लेशियरों की लगातार निगरानी करना तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण है और दोनों देशों के बीच सहयोग जारी है।
ग्लेशियर और चट्टानों के विशाल हिस्से के टूटने से बनी भयावह स्थिति
विशेषज्ञों की शुरुआती जांच में सामने आया है कि हिमालय के लैंगटांग क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टानी हिस्से के बड़े पैमाने पर टूटने के बाद भारी मात्रा में बर्फ, पानी, चट्टान और मलबा तेजी से नीचे की ओर आया। इस घटना ने नदी के प्रवाह को प्रभावित किया और बाद में पानी व मलबे का विशाल सैलाब निचले इलाकों तक पहुंच गया।
अमेरिकी भूवैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर भी यह संकेत मिले हैं कि ग्लेशियर के निचले हिस्से का एक बड़ा भाग ऊंचाई से टूटकर घाटी में गिरा था। इससे नदी का रास्ता कुछ समय के लिए अवरुद्ध हुआ और अस्थायी अवरोध बनने के बाद पानी, कीचड़ और चट्टानों का विनाशकारी प्रवाह नीचे की ओर फैल गया। दूसरी ओर, चीन की तरफ से इस घटना के कारणों को लेकर अलग दावे भी सामने आए हैं, जिससे आपदा की सटीक वजह पर बहस जारी है।
निगरानी केंद्र भी बाढ़ में बह गए
आपदा की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बाढ़ और मलबे ने रास्ते में मौजूद कई महत्वपूर्ण ढांचों और निगरानी व्यवस्थाओं को भी नुकसान पहुंचाया। इससे राहत और बचाव अभियान के साथ-साथ भविष्य के खतरों का आकलन करना भी मुश्किल हो गया।विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय में बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से अस्थिर हो रहे हैं। बर्फ पिघलने, चट्टानों के कमजोर होने और हिमनदों में बदलाव जैसी घटनाएं अचानक बाढ़ और भूस्खलन के खतरे को बढ़ा सकती हैं। यही वजह है कि नेपाल अब सीमा पार वास्तविक समय में डेटा साझा करने और अधिक मजबूत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करने पर जोर दे रहा है।
मृतकों और लापता लोगों की संख्या लगातार बढ़ी
इस प्राकृतिक त्रासदी में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है, जबकि हजारों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। राहतकर्मी मलबे, नदी किनारों और दूरदराज के इलाकों में लगातार तलाश अभियान चला रहे हैं। विदेशी पर्यटक, तीर्थयात्री और जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े कर्मचारी भी प्रभावित लोगों में शामिल हैं।
बारिश, नए भूस्खलन और क्षतिग्रस्त सड़कों ने बचाव अभियान को और कठिन बना दिया है। कई क्षेत्रों तक पहुंचना अभी भी चुनौती बना हुआ है। भारत समेत कई देशों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की मदद से राहत कार्य चल रहा है।
नेपाल के सामने अब दोहरी चुनौती
नेपाल के लिए फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता लापता लोगों को ढूंढना, प्रभावित परिवारों तक राहत पहुंचाना और शवों की पहचान करना है। इसके साथ ही भविष्य में ऐसी आपदाओं से बचने के लिए वैज्ञानिक निगरानी और पड़ोसी देशों के साथ समय पर जानकारी साझा करने की व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी हो गया है।
इस त्रासदी ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों की अस्थिरता और सीमापार आपदा संबंधी डेटा साझा करने की अहमियत को सामने ला दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जोखिम वाले इलाकों की लगातार निगरानी, बेहतर तकनीक और समय पर चेतावनी की मजबूत व्यवस्था विकसित नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में ऐसी प्राकृतिक घटनाएं और बड़ी चुनौती बन सकती हैं।
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