नेपाल बाढ़: अपनों की पहचान के लिए DNA बना आखिरी उम्मीद, 5 हजार अब भी लापता

(न्यूज़लाइवनाउ-Nepal) नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ ने हजारों परिवारों को ऐसी त्रासदी में धकेल दिया है, जहां अपनों के जिंदा होने या न होने की खबर का इंतजार अब भी खत्म नहीं हुआ है। बाढ़ और मलबे के बीच बरामद हुए कई शव इतनी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं कि चेहरे, कपड़ों या शरीर के सामान्य निशानों से उनकी पहचान करना बेहद मुश्किल हो रहा है। ऐसे हालात में डीएनए जांच लापता लोगों के परिवारों के लिए सच्चाई तक पहुंचने का सबसे भरोसेमंद जरिया बनती जा रही है।

1300 से ज्यादा मौतें

नेपाल की इस प्राकृतिक आपदा में मृतकों की संख्या 1300 के पार पहुंच चुकी है, जबकि करीब 5 हजार लोगों के अभी भी लापता होने की सूचना है। बाढ़ का तेज बहाव शवों को घटनास्थल से काफी दूर तक बहाकर ले गया। कई शव पानी, कीचड़ और मलबे में लंबे समय तक पड़े रहने के कारण क्षत-विक्षत हो गए। इससे परिजनों के लिए अपने रिश्तेदारों को पहचानना बेहद कठिन हो गया है।

2,272 डीएनए नमूने जुटाए गए

नेपाल पुलिस ने मृतकों और उनके संभावित परिजनों के डीएनए नमूने एकत्र करने की प्रक्रिया तेज कर दी है। अब तक 2,272 सैंपल जुटाए जा चुके हैं। इनमें 1,260 नमूने शवों से और 1,012 नमूने परिजनों से लिए गए हैं। इन जैविक नमूनों का आपस में मिलान कर यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि बरामद अवशेष किस लापता व्यक्ति के हैं।

1,030 शव दफनाए गए

अधिकारियों के अनुसार डीएनए नमूने लेने और पहचान से जुड़ी अन्य जरूरी प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद 1,030 शवों को दफनाया जा चुका है। इनमें 222 महिलाएं, 355 पुरुष और 453 ऐसे शव शामिल हैं जिनका लिंग निर्धारित नहीं हो सका। हालांकि, अब तक केवल 96 शवों की पहचान के बाद उन्हें उनके परिवारों को सौंपा गया है।

नेपाल पुलिस ने अज्ञात शवों से जुड़ी जानकारी भी सार्वजनिक की है। करीब 1,270 अज्ञात शवों का विवरण पुलिस की वेबसाइट पर उपलब्ध कराया गया है, ताकि परिवार तस्वीरों और अन्य विवरणों के आधार पर अपने लापता परिजनों की तलाश कर सकें।

DNA ही क्यों जरूरी?

बाढ़ में लंबे समय तक पानी और मलबे के संपर्क में रहने से शरीर की पहचान संबंधी कई विशेषताएं नष्ट हो सकती हैं। कुछ मामलों में चेहरे से पहचान संभव नहीं रह जाती। ऐसे में उंगलियों के निशान, दांतों के रिकॉर्ड, टैटू, आभूषण या कपड़ों से पहचान करने की कोशिश की जाती है, लेकिन हर शव में ये तरीके काम नहीं करते।

डीएनए इस स्थिति में महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि शव से प्राप्त जैविक नमूने की तुलना उसके करीबी जैविक रिश्तेदार के नमूने से की जा सकती है। माता-पिता, संतान और भाई-बहन जैसे करीबी रिश्तेदारों के नमूने पहचान प्रक्रिया में विशेष उपयोगी होते हैं।

परिजनों के लिए स्थानीय स्तर पर बनाए गए सैंपल सेंटर

डीएनए जांच के लिए परिवारों को दूर-दराज से काठमांडो आने की परेशानी न हो, इसके लिए नेपाल पुलिस ने नुवाकोट के बिदुर में डीएनए सैंपल कलेक्शन सेंटर भी शुरू किया है। इससे लापता लोगों के करीबी रिश्तेदार स्थानीय स्तर पर अपने जैविक नमूने दे सकते हैं।नेपाल पुलिस ने विदेशों में रह रहे लापता लोगों के प्रथम श्रेणी के रिश्तेदारों के लिए भी व्यवस्था बताई है। वे अधिकृत प्रयोगशाला से डीएनए प्रोफाइल तैयार कराकर उसे नेपाल पुलिस को भेज सकते हैं, ताकि बरामद शवों या अवशेषों से उसका मिलान किया जा सके।

त्रासदी के बीच इंसानियत की मिसाल

इस आपदा की भयावहता के बीच कुछ पीड़ित खुद अपना दर्द भूलकर दूसरों की मदद में जुटे हुए हैं। रसुवा के सुदीप कुमार न्यौपाने ने अपने छोटे भाई और दोस्त को खोने के बावजूद राहत कार्य शुरू कर दिया। वे बेघर हुए लोगों तक भोजन और जरूरी सामान पहुंचा रहे हैं।

इसी तरह सुचित जोशी के परिवार के कई सदस्य अभी लापता हैं, लेकिन उन्होंने राहत टीम बनाकर बाढ़ में फंसे बुजुर्गों और अन्य लोगों को सुरक्षित निकालने का काम जारी रखा है। अपने ही परिवार के दुख के बीच दूसरों की जिंदगी बचाने की यह कोशिश नेपाल की इस त्रासदी में मानवीय साहस की अलग तस्वीर पेश कर रही है।

DNA रिपोर्ट सिर्फ जांच नहीं, जवाब है

नेपाल की बाढ़ ने हजारों परिवारों को अनिश्चितता में डाल दिया है। कई लोगों को अब भी यह पता नहीं कि उनके प्रियजन जीवित हैं या इस आपदा का शिकार हो चुके हैं। ऐसे में डीएनए परीक्षण केवल वैज्ञानिक पहचान की प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि उन परिवारों के लिए एक निश्चित जवाब पाने का अंतिम रास्ता बन गया है, जो कई दिनों से इंतजार और आशंका के बीच जी रहे हैं।

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