(न्यूज़लाइवनाउ-MP) मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह की ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ को लेकर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। उज्जैन से अयोध्या तक प्रस्तावित करीब 950 किलोमीटर की इस पदयात्रा के जरिए दिग्विजय सिंह ने धार्मिक स्थलों पर चढ़ावे के कथित गबन, मंदिरों की व्यवस्था में पारदर्शिता और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों को प्रमुखता से उठाया है। इस बीच, यात्रा को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के रुख ने राजनीतिक बहस को और हवा दे दी है।
विजयादशमी पर उज्जैन से शुरू हुई यात्रा
दिग्विजय सिंह ने 20 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी के अवसर पर उज्जैन से अपनी यात्रा का आगाज किया। इसकी शुरुआत से पहले उन्होंने पत्नी अमृता राय के साथ धार्मिक अनुष्ठान किए। चिंतामन गणेश मंदिर में दर्शन, पार्थिव शिवलिंग का पूजन और बाबा महाकाल के दर्शन के बाद यात्रा आगे बढ़ी।
इस पदयात्रा को लगभग 70 दिनों में पूरा करने की योजना है। इसके तहत प्रतिदिन करीब 15 किलोमीटर पैदल चलने का लक्ष्य रखा गया है। यात्रा का अंतिम पड़ाव अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर होगा। आयोजकों के मुताबिक, इस अभियान में कांग्रेस के झंडे और पार्टी के प्रचार संबंधी बैनरों का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
यात्रा का खर्च 30 से 40 लाख रुपये तक पहुंचने का अनुमान
इस अभियान के साथ इसके आयोजन पर आने वाले खर्च को लेकर भी चर्चा हो रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ग्रामीण इलाकों में छोटे पड़ावों पर प्रतिदिन लगभग 20 से 30 हजार रुपये, जबकि बड़े पड़ावों पर 50 से 60 हजार रुपये तक खर्च होने का अनुमान है। औसतन प्रतिदिन 30 से 50 हजार रुपये के हिसाब से करीब 70 दिनों की यात्रा का कुल बजट 30 से 40 लाख रुपये तक आंका गया है।
कांग्रेस ने बनाई आधिकारिक दूरी, फिर भी कई नेता समर्थन में
यात्रा को लेकर कांग्रेस के भीतर भी अलग-अलग रुख देखने को मिल रहे हैं। मध्य प्रदेश कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर इस अभियान से दूरी रखी है, हालांकि प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी समेत पार्टी के कुछ नेताओं ने इसका समर्थन किया है। पटवारी और पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने यात्रा के संदर्भ में कथित चंदा अनियमितताओं और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे उठाए हैं।
यात्रा में कई साधु-संतों और धार्मिक हस्तियों का समर्थन मिलने की भी खबर है। इनमें कंप्यूटर बाबा सहित कुछ प्रमुख संतों के नाम शामिल हैं। इस तरह यह अभियान धार्मिक उद्देश्य के साथ-साथ राजनीतिक विमर्श का विषय भी बन गया है।
बीजेपी ने उठाए सवाल, चुनावी स्टंट बताया
दिग्विजय सिंह की पदयात्रा पर बीजेपी नेताओं ने सवाल खड़े किए हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि भगवान के नाम पर यात्रा करने के पीछे भावना भी महत्वपूर्ण होती है। वहीं, राज्य सरकार में मंत्री विश्वास सारंग ने इस अभियान की मंशा पर सवाल उठाते हुए इसे सनातन परंपरा को विभाजित करने वाला बताया।
साध्वी के रूप में चर्चित हर्षा रिछारिया ने भी यात्रा पर आपत्ति जताई। उन्होंने सवाल किया कि राम मंदिर निर्माण के समय जैसी सक्रियता दिखाई देनी चाहिए थी, वैसी अब मंदिर के चढ़ावे को लेकर सवाल उठाने में क्यों नजर आ रही है। उनके मुताबिक, चुनाव नजदीक आने पर भगवान राम और मंदिर से जुड़े मुद्दों को उठाना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। ये बीजेपी पक्ष की प्रतिक्रियाएं और आरोप हैं।
अमृता राय ने धर्म और अधर्म की लड़ाई से जोड़ा अभियान
दिग्विजय सिंह की पत्नी अमृता राय ने यात्रा को धर्म की विजय के संकल्प से जोड़कर देखा है। उन्होंने भगवान राम के रावण-वध के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस तरह भगवान राम ने अधर्म के विरुद्ध संघर्ष किया था, उसी भावना के साथ यह यात्रा निकाली जा रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि भगवान शिव के आशीर्वाद से अभियान का उद्देश्य पूरा होगा।
दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह ने भी इस पदयात्रा की कठिनाई का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि 79 वर्ष की उम्र में लगभग एक हजार किलोमीटर पैदल चलना आसान नहीं है, लेकिन यात्रा का समापन अयोध्या में करने का संकल्प लिया गया है।
धार्मिक पारदर्शिता और वोट से जुड़े सवालों पर जोर
इस यात्रा के पीछे दो प्रमुख मुद्दे सामने आए हैं—धार्मिक संस्थानों में चढ़ावे और अन्य संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता तथा चुनावी प्रक्रिया की जवाबदेही। दिग्विजय सिंह ने मंदिरों में कथित अनियमितताओं और वोट से संबंधित शिकायतों की जांच की मांग उठाई है। इन आरोपों को प्रमाणित तथ्य के बजाय उनके द्वारा उठाए गए सवालों और दावों के रूप में देखा जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, उज्जैन से अयोध्या तक की यह पदयात्रा अब केवल धार्मिक यात्रा तक सीमित नहीं रह गई है। एक ओर आयोजक इसे सनातन परंपरा के सम्मान और पारदर्शिता की मांग से जोड़ रहे हैं, तो दूसरी ओर बीजेपी इसकी राजनीतिक मंशा पर सवाल उठा रही है। कांग्रेस की आधिकारिक दूरी और पार्टी के कुछ नेताओं का समर्थन भी इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना रहा है।
Comments are closed.