नई दिल्ली: देश के प्रमुख स्वास्थ्य संस्थान ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेस (AIIMS) के रयूमेटोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. उमा कुमार ने अभी हाल ही में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग स्वयं निदान (self-diagnosis) या स्व-उपचार (self-treatment) के लिए करने के खिलाफ स्पष्ट चेतावनी जारी की है। उन्होंने कहा कि AI आधारित चैटबॉट्स और तकनीकें स्वास्थ्य सलाह के लिए उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन इन्हें डॉक्टरों की जगह नहीं लेना चाहिए।
डॉ. कुमार ने बताया कि कई लोग अपनी स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान खुद AI के माध्यम से खोजने की कोशिश कर रहे हैं, जो गंभीर परिणाम दे सकता है। उन्होंने एक मरीज का उदाहरण देते हुए कहा कि एक व्यक्ति ने अपने पीठ दर्द का निदान ChatGPT से किया और बिना चिकित्सकीय सलाह के नॉन-स्टेरॉइडल एंटी-इन्फ्लेमेटरी ड्रग्स (NSAIDs) लेना शुरू कर दिया, जिससे उसके शरीर में खून बहने की समस्या पैदा हो गई। इसका मुख्य कारण सही जांच-परख न करना और दवा को बिना जांच के लेना बताया गया।
डॉ. कुमार ने जोर देकर कहा कि किसी भी बीमारी की पहचान केवल लक्षणों के आधार पर नहीं हो सकती। “सभी रोगों का निदान बाहिष्करण के आधार पर किया जाता है और दवाइयाँ केवल जांच-परख के बाद ही दी जानी चाहिए,” उन्होंने कहा। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “AI का उपयोग आत्म-निदान या आत्म-उपचार के लिए न करें।”
साथ ही, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) और नेशनल बोर्ड ऑफ़ एग्ज़ामिनेशन इन मेडिकल साइंसेस (NBEMS) के प्रमुख डॉ. अभिजात शेट ने भी कहा है कि AI स्वास्थ्य सेवा में सहायक उपकरण हो सकता है, लेकिन यह चिकित्सकीय नैतिकता और मानकों को प्रभावित नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी कहा कि AI कभी भी वास्तविक डॉक्टर की जगह नहीं ले सकता है, बल्कि चिकित्सा प्रगति का एक सहायक हिस्सा है।
डॉ. शेट ने यह भी स्पष्ट किया कि चिकित्सा शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए AI का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन इसके उपयोग में संतुलन और समझ आवश्यक है, ताकि मरीजों की सुरक्षा और गुणवत्ता चिकित्सा सेवा बनी रहे।
विशेषज्ञों का मानना है कि AI तकनीक स्वास्थ्य संगठनों और चिकित्सकों के लिए लाभदायक है, लेकिन जनता को इसके सीमित उपयोग और जोखिमों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए, ताकि गलत निदान और दवा संबंधी गलतियों से बचा जा सके।
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